(अलिंद चौहान)
नयी दिल्ली, 24 फरवरी (भाषा) राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा 81,000 करोड़ रुपये की ग्रेट निकोबार व्यापक अवसंरचना परियोजना का मार्ग प्रशस्त करने के कुछ दिनों बाद, कंजर्वेशन एक्शन ट्रस्ट (सीएटी) के कार्यकारी न्यासी देबी गोयनका ने कहा कि अधिकरण को परियोजना के रणनीतिक महत्व के बजाय इसके पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर अधिक चिंतित होना चाहिए था।
पर्यावरण संरक्षण से संबंधित गैर-लाभकारी संगठन, सीएटी, वाद शुरू होने के ‘‘पहले दौर’’ का हिस्सा था, जिसने परियोजना को दी गई पर्यावरण मंजूरी को 2022 में अधिकरण के समक्ष चुनौती दी थी। उस समय भी अधिकरण ने परियोजना की मंजूरी में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था।
गोयनका ने कहा, ‘‘अगर सरकार का किसी परियोजना में महत्वपूर्ण हित है, तो अधिकरण और यहां तक कि उच्चतम न्यायालय भी पर्यावरण पर प्रभाव डालने वाली किसी परियोजना पर रोक लगाने को इच्छुक नहीं है।’’
अधिकरण का 16 फरवरी का फैसला वाद के ‘‘दूसरे दौर’’ में आया, जिसमें इसने प्रवाल संरक्षण, पर्यावरणीय आंकड़ों की पर्याप्तता और क्षेत्रीय उल्लंघनों से संबंधित मुद्दों पर ‘‘पुनर्विचार’’ करने के लिए 2023 में गठित अधिकार प्राप्त समिति के निष्कर्षों की समीक्षा की।
अपने आदेश में, अधिकरण ने एक ‘‘संतुलित दृष्टिकोण’’ अपनाया, जिसमें परियोजना के सामरिक महत्व के मुकाबले पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों का मूल्यांकन किया गया।
गोयनका ने कहा, ‘‘द्वीप पर पहले से ही एक रक्षा प्रतिष्ठान मौजूद है जिसका इस्तेमाल सशस्त्र बल दशकों से करते आ रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि वाणिज्यिक बंदरगाह से रक्षा क्षमता में कोई वृद्धि होगी। साथ ही, अधिकरण का उद्देश्य पर्यावरण की रक्षा करना है। यदि यह पर्यावरण की तुलना में सामरिक हितों को अधिक महत्व देता है, तो हमें पर्यावरण अधिकरण की आवश्यकता नहीं है।’’
परियोजना 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है। परियोजना में एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एक एकीकृत शहर, एक नागरिक और सैन्य हवाई अड्डा और 450 मेगावाट क्षमता वाला गैस एवं सौर ऊर्जा आधारित संयंत्र का निर्माण शामिल है।
केंद्र सरकार का तर्क है कि चूंकि यह परियोजना ग्रेट निकोबार द्वीप पर स्थित है – जो मलक्का जलडमरूमध्य के निकट है और एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुद्री परिवहन मार्ग है – इसलिए यह भारत के समुद्री व्यापार को बढ़ावा देने और क्षेत्र में अन्य देशों की बढ़ती उपस्थिति का मुकाबला करने में सहायक होगी।
हालांकि, गोयनका सहित अन्य पर्यावरणविदों का कहना है कि इन ‘‘लाभों’’ के लिए पर्यावरण और सामाजिक दृष्टि से भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
पर्यावरणविदों द्वारा संदर्भित क्षेत्र प्रस्तावित ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह का स्थान है, जो ग्रेट निकोबार का दक्षिणी छोर, गलाथिया खाड़ी में स्थित है। यह लेदरबैक कछुओं का घोंसला बनाने का स्थान है, प्रवाल और मैंग्रोव वनों का क्षेत्र है और जहां लुप्तप्राय निकोबार मेगापोड्स (लुप्तप्राय पक्षी) रहते हैं।
गोयनका ने कहा, ‘‘इस परियोजना से 130 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला जंगल नष्ट हो जाएगा। हमें यह भी नहीं पता कि इन वनों में कौन सी स्थानिक या लुप्तप्राय प्रजातियां रहती हैं या मानव के लिए इनका जैव विविधता महत्व क्या है। इस परियोजना से क्षेत्र के प्रवाल भी प्रभावित होंगे और कछुओं के घोंसले बनाने के स्थान भी नष्ट हो जाएंगे।’’
गोयनका ने यह भी कहा कि ग्रेट निकोबार परियोजना से वहां की आदिम जनजातियों, विशेष रूप से शोम्पेन लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
पर्यावरणविद ने कहा, ‘‘शोम्पेन एक छोटा समूह है जो केवल इसी द्वीप पर रहता है। बाहरी लोगों से उनका संपर्क बहुत कम है और उनकी जीवनशैली को हम अभी तक पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं। वे नदियों के किनारे-किनारे यात्रा करते हैं क्योंकि उनके जंगल में सड़कें नहीं हैं। यदि यह परियोजना उनके क्षेत्र के इस जंगल को नष्ट कर देती है, तो इसके पूरे प्रभाव का कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। लेकिन यह निश्चित रूप से सकारात्मक नहीं होगा।’’
अधिकरण ने कहा है कि इस परियोजना के कारण आदिम जनजाति को कोई समस्या नहीं होगी और न ही उन्हें विस्थापित होना पड़ेगा और वन अधिकार अधिनियम के तहत उनके अधिवास अधिकारों की रक्षा की जाएगी।
हालांकि, जनवरी में, ग्रेट निकोबार की आदिवासी परिषद ने आरोप लगाया कि द्वीप प्रशासन उन पर इन गांवों पर अपने दावे छोड़ने के लिए दबाव डाल रहा है।
हालांकि, अधिकरण ने अपने फैसले में अधिकारियों को पर्यावरणीय मंजूरी में सूचीबद्ध शर्तों का ‘‘पूर्ण और कड़ाई से’’ अनुपालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया है, लेकिन गोयनका ने इसे लेकर संशय जताया है।
भाषा सुभाष मनीषा
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