पर्यावरणविदों और नीति विशेषज्ञों ने अरावली मामले में न्यायालय के आदेश पर गठित समिति पर चिंता जताई

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पर्यावरणविदों और नीति विशेषज्ञों ने अरावली मामले में न्यायालय के आदेश पर गठित समिति पर चिंता जताई

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  • Publish Date - June 19, 2026 / 08:50 PM IST,
    Updated On - June 19, 2026 / 08:50 PM IST

नयी दिल्ली, 19 जून (भाषा) वैज्ञानिकों, पर्यावरण और नीति विशेषज्ञों तथा अन्य संबंधित पक्षों ने प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखकर उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित उस उच्चाधिकार प्राप्त विशेषज्ञ समिति पर सवाल उठाए हैं, जिसे अरावली पर्वत शृंखला की परिभाषा और सीमा-निर्धारण से जुड़ी केंद्र की रिपोर्ट की समीक्षा करने का काम सौंपा गया है।

बृहस्पतिवार और शुक्रवार को लिखे गए इन पत्रों में समिति की स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताते हुए इसके गठन में बदलाव की मांग की गई है।

शीर्ष अदालत के 25 मई के आदेश के तहत गठित समिति की अध्यक्षता भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद की महानिदेशक कंचन देवी कर रही हैं और उन्हें 31 अगस्त तक रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।

इस समिति के अन्य सदस्यों में भारतीय वन सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक डॉ. सुभाष आशुतोष; भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा; पर्यावरण मंत्रालय में पूर्व संयुक्त सचिव बृज मोहन सिंह राठौर; और दिल्ली विश्वविद्यालय में वनस्पति विभाग के पूर्व प्रमुख प्रोफ़ेसर अशोक के. भटनागर शामिल हैं।

न्यायालय ने बेंगलुरु स्थित भारतीय मानव बस्ती संस्थान के प्रोफ़ेसर जगदीश कृष्णस्वामी और केंद्रीय विश्वविद्यालय हरियाणा के प्रोफ़ेसर लक्ष्मीकांत शर्मा को भी विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर नियुक्त किया, जिन्हें ज़रूरत पड़ने पर अध्यक्ष द्वारा समिति के काम में शामिल किया जा सकता है।

पर्यावरण मंत्रालय को निर्देश दिया गया कि वह समिति के सदस्य सचिव के तौर पर काम करने के लिए निदेशक रैंक के एक अधिकारी को नामित करे।

मामले से संबंधित एक पत्र में, पर्यावरणविद् और सामाजिक वैज्ञानिक डॉ. रवि चोपड़ा ने विवादित मुद्दों पर स्वतंत्र लिखित राय देने की समिति की क्षमता पर संदेह जताया। उन्होंने कहा कि समिति के लगभग सभी सदस्य मौजूदा या सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी हैं।

उच्चतम न्यायालय की बनाई दो समितियों के अध्यक्ष के तौर पर अपने अनुभव का ज़िक्र करते हुए चोपड़ा ने लिखा कि उनके अनुभव के अनुसार, सरकारी संस्थानों के वैज्ञानिकों और मौजूदा व सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारियों ने चर्चा के दौरान अलग राय ज़ाहिर करने के बावजूद, ‘‘कभी भी सत्तारूढ़ सरकार की राय के ख़िलाफ़ वोट नहीं दिया’’।

वहीं, एक अन्य पत्र में, पर्यावरण और नीति विशेषज्ञ सागर धारा ने उच्चतम न्यायालय द्वारा पूर्व में गठित उच्चाधिकार प्राप्त समितियों के उदाहरण दिए, जिनकी अध्यक्षता जाने-माने वैज्ञानिकों और स्वतंत्र विशेषज्ञों ने की थी।

उन्होंने कहा, ‘‘जाने-माने भौतिक विज्ञानी प्रोफ़ेसर एमजीके मेनन को 1997 में खतरनाक कचरे के प्रबंधन के लिए एक व्यापक नियामक ढांचा तैयार करने के मकसद से बनाई गई उच्चाधिकार प्राप्त समिति का प्रमुख नियुक्त किया गया था। अरावली के संरक्षण और बचाव के मामले में भी इसी तरह के नज़रिए की ज़रूरत है, जहां सदस्यों और अध्यक्ष का चुनाव सिर्फ़ मौजूदा या सेवानिवृत्त हो चुके सरकारी अधिकारियों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए।’’

इस बीच, पंजाब की पर्यावरणविद् समिता कौर ने समिति में ऐसे सदस्यों को नियुक्त करने की मांग की, जिन्हें स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों, पारंपरिक आजीविका सहित कामकाज से जुड़े मुद्दों, पारिस्थितिकी, वन्यजीव, जल-विज्ञान आदि के मामलों में विशेषज्ञता हासिल हो।

भाषा नेत्रपाल संतोष

संतोष