नयी दिल्ली, 16 फरवरी (भाषा) उत्तर प्रदेश सरकार ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय से कहा कि नोएडा में साल 2021 में हुई घृणा अपराध की कथित घटना के सिलसिले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-153बी के तहत प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए थी, जिसमें राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक आरोपों और दावों के लिए सजा का प्रावधान है।
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ से कहा, “ उन्हें (आईपीसी की) धारा-153बी के तहत प्राथमिकी दर्ज करनी चाहिए थी… हालांकि, उन्होंने ऐसा नहीं किया।”
उन्होंने कहा कि मामले में आरोप पत्र पहले ही दाखिल किया जा चुका है।
शीर्ष अदालत ने तीन फरवरी को उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया था कि 2021 में घृणा अपराध के कथित मामले में दर्ज प्राथमिकी में आईपीसी के प्रासंगिक प्रावधानों को क्यों नहीं शामिल किया गया था।
नटराज ने कहा कि इसका एक समाधान यह हो सकता है कि राज्य मामले में आगे की जांच के लिए संबंधित अदालत में आवेदन दायर करे और सरकार से मंजूरी हासिल करने के लिए एक प्रस्ताव भेजा जाए।
उन्होंने कहा कि दूसरा समाधान यह हो सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में आगे की कार्रवाई के लिए निर्देश जारी करे।
पीठ ने कहा, “बेहतर होगा कि आप ऐसा करें। इससे आपकी छवि बेहतर होगी।”
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि शीर्ष अदालत इस संबंध में निर्देश दे सकती है।
पीठ ने नटराज की ओर से दी गई दलीलों का जिक्र किया और कहा कि प्राधिकारी मामले में आगे की कार्रवाई करेंगे।
जब याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि शीर्ष अदालत याचिकाकर्ता को मुआवजा देने पर विचार कर सकती है, तो पीठ ने कहा, “जहां तक मुआवजे का सवाल है, आपको उचित मंच के समक्ष उपाय तलाशने होंगे।”
नटराज ने कहा कि राज्य सरकार इस मामले में आगे की जांच के लिए एक हफ्ते के भीतर संबंधित अदालत में आवेदन दायर करेगी।
उच्चतम न्यायालय जुलाई 2021 में नोएडा में कथित घृणा अपराध के तहत दुर्व्यवहार और यातना का सामना करने वाले एक वरिष्ठ नागरिक की शिकायत पर मामले की निष्पक्ष जांच एवं सुनवाई के अनुरोध वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
भाषा पारुल अविनाश
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