डल झील पर तैरता सिनेमा, आईएफएफजेके में फिल्म प्रदर्शन ने दर्शकों को किया आकर्षित

डल झील पर तैरता सिनेमा, आईएफएफजेके में फिल्म प्रदर्शन ने दर्शकों को किया आकर्षित

डल झील पर तैरता सिनेमा, आईएफएफजेके में फिल्म प्रदर्शन ने दर्शकों को किया आकर्षित
Modified Date: September 10, 2026 / 11:13 am IST
Published Date: September 10, 2026 11:13 am IST

श्रीनगर, 10 सितंबर (भाषा) जम्मू-कश्मीर की शांत डल झील में पहली बार सिनेमा का अनोखा अनुभव देखने को मिला, जहां बड़े तैरते पर्दे पर फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। जम्मू-कश्मीर के अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफजेके) के दौरान आयोजित ‘फ्लोटिंग सिनेमा’ दर्शकों और राहगीरों के आकर्षण का केंद्र बन गया है।

चार दिवसीय फिल्म महोत्सव की शुरुआत सात सितंबर को हुई थी और ‘फ्लोटिंग सिनेमा’ इसकी सबसे खास पहलों में शामिल रहा। इसने कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता और सिनेमाई विरासत से जुड़े माहौल में फिल्मों के प्रदर्शन को नया रूप दिया है।

‘फ्लोटिंग सिनेमा’ की शुरुआत, महोत्सव के पहले दिन 1961 में बनी क्लासिक फिल्म ‘जंगली’ के प्रदर्शन के साथ हुई। डल झील की पृष्ठभूमि में फिल्म दिखाए जाने के दौरान बड़ी संख्या में दर्शक झील के किनारे पहुंचे और यह नजारा यादगार बन गया।

पर्दे पर रोशनी पड़ते ही परिवार, देश-विदेश से आए पर्यटक, फिल्म प्रेमी और उत्सुक लोग झील के किनारों पर जुटने लगे।

महोत्सव के आयोजन से जुड़े एक अधिकारी ने कहा, ‘‘यह अनुभव पारंपरिक तरीके से फिल्म देखने से हटकर है। दर्शक उन प्राकृतिक दृश्यों से घिरे हुए सिनेमा देख रहे हैं, जिन्होंने पीढ़ियों से फिल्म निर्माताओं को प्रेरित किया है।’’

उन्होंने कहा कि यह पहल आईएफएफजेके के उस प्रयास को भी दर्शाती है, जिसके तहत सिनेमा को पारंपरिक थिएटरों से बाहर निकालकर सार्वजनिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों तक पहुंचाया जा रहा है।

बुधवार को ‘फ्लोटिंग सिनेमा’ में हिंदी फिल्म ‘कश्मीर की कली’ दिखाई गई, जिसमें शम्मी कपूर की ऊर्जा और शर्मिला टैगोर की आकर्षक अदाकारी ने दर्शकों को पुराने दौर की याद दिलाई।

महोत्सव के अंतिम दिन 10 सितंबर को यश चोपड़ा की 1976 में बनी चर्चित फिल्म ‘कभी कभी’ का प्रदर्शन किया जाएगा, जो कश्मीर से जुड़ी हिंदी सिनेमा की परंपरा की एक और यादगार फिल्म है।

झील के पानी के ऊपर फिल्मों का प्रदर्शन और किनारे पर जुटे दर्शकों के साथ डल झील अब केवल महोत्सव की पृष्ठभूमि नहीं रह गई है, बल्कि वह खुद इस सिनेमाई अनुभव का हिस्सा बन गई है।

भाषा मनीषा वैभव

वैभव


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