जेल रिकॉर्ड में दर्ज पते पर नहीं मिला खालड़ा मामले का दोषी पूर्व पुलिस उपाधीक्षक

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जेल रिकॉर्ड में दर्ज पते पर नहीं मिला खालड़ा मामले का दोषी पूर्व पुलिस उपाधीक्षक

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  • Publish Date - July 10, 2026 / 02:06 PM IST,
    Updated On - July 10, 2026 / 02:06 PM IST

होशियारपुर (पंजाब), 10 जुलाई (भाषा) मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के 1995 में अपहरण और हत्या मामले में उम्रकैद की सजा पाने वाला पंजाब पुलिस का पूर्व पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) जसपाल सिंह नाभा जेल के रिकॉर्ड में दर्ज अपने गांव के पते पर नहीं मिला। अधिकारियों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।

जसपाल सिंह को 2023 में जमानत पर रिहा किया गया था।

खालड़ा के जीवन पर आधारित फिल्म ‘सतलुज’ को जी5 पर रिलीज किए जाने और बाद में हटाए जाने के बाद इस मामले ने फिर से लोगों का ध्यान खींचा है। ऐसे में जेल प्राधिकारियों के अनुरोध पर यह सत्यापन किया गया।

सदर थाने के सहायक उप निरीक्षक (एएसआई) जसविंदर सिंह ने बताया कि जेल प्राधिकारियों ने आधिकारिक पत्र के माध्यम से यह सत्यापित करने को कहा था कि जसपाल सिंह होशियारपुर जिले के उस मांझी गांव में रह रहा है या नहीं, जो जेल रिकॉर्ड में उसके पते के रूप में दर्ज है।

एएसआई ने बताया कि जब पुलिस गांव पहुंची तो सरपंच और ग्रामीणों ने बताया कि जसपाल सिंह वहां नहीं रह रहा है।

थाना प्रभारी बलजिंदर सिंह मल्ही ने कहा कि जसपाल सिंह को अदालत के आदेश के तहत 27 मई, 2023 को नाभा जेल से अंतरिम जमानत पर रिहा किया गया था। उन्होंने बताया कि सत्यापन में यह स्थापित हुआ कि वह जेल दस्तावेजों में दर्ज पते पर नहीं रह रहा है।

दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ का नाम पहले ‘पंजाब ’95’ था। इसमें दिलजीत दोसांझ ने खालड़ा की भूमिका निभाई है। यह फिल्म तीन जुलाई को जी5 पर रिलीज की गई थी लेकिन दो दिन बाद इसे मंच से हटा दिया गया।

हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी यह फिल्म खालड़ा की उस जांच को दिखाती है, जिसमें उन्होंने राज्य में उग्रवाद के चरम पर होने के दौरान पुलिस द्वारा ‘‘अज्ञात’’ बताकर हजारों शवों का ‘‘अवैध तरीके से’’ अंतिम संस्कार किए जाने का मामला उजागर किया था।

खालड़ा का सितंबर 1995 में अमृतसर में उनके घर के सामने से अपहरण कर लिया गया था। बाद में पता चला कि उनकी हत्या कर दी गई थी लेकिन उनका शव कभी नहीं मिला।

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की अदालत ने पूर्व डीएसपी जसपाल सिंह और एएसआई अमरजीत सिंह को नवंबर 2005 में उम्रकैद की सजा सुनाई थी जबकि चार अन्य पुलिसकर्मियों को मामले में सात-सात साल की कैद की सजा दी गई थी।

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने अमरजीत सिंह को 2007 में बरी कर दिया था और चार अन्य दोषियों की सजा बढ़ाकर उम्रकैद कर दी थी। उच्चतम न्यायालय ने 2011 में इस फैसले को बरकरार रखा था।

इस मामले पर जारी विवाद के बीच आम आदमी पार्टी (आप) ने विपक्ष के उन आरोपों को खारिज किया है कि पंजाब सरकार ने जसपाल सिंह की समय पूर्व रिहाई का प्रस्ताव भेजा था।

यह राजनीतिक विवाद तब शुरू हुआ, जब शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने आरोप लगाया कि ‘आप’ सरकार ने जसपाल सिंह की सजा में छूट की मांग की, उसकी रिहाई में मदद की और अंतरिम जमानत मिलने के बाद उसका पता लगाने में विफल रही।

‘आप’ की पंजाब इकाई के मीडिया प्रभारी बलतेज पन्नू ने कहा कि सीबीआई मामले में समय पूर्व रिहाई के किसी भी आवेदन पर फैसला केंद्रीय गृह मंत्रालय करता है, पंजाब सरकार नहीं।

पन्नू ने कहा कि जसपाल सिंह की सजा में छूट संबंधी अर्जी 2017 में गृह मंत्रालय के समक्ष दायर की गई थी जिसे 2018 में खारिज कर दिया गया था और इसके बाद राज्यपाल ने भी याचिका खारिज कर दी थी।

उन्होंने कहा कि 2019 में एक और सिफारिश गृह मंत्रालय को भेजी गई थी, जबकि अन्य जीवित सह-दोषियों की इसी तरह की अर्जियां 2023 में खारिज कर दी गई थीं।

‘आप’ नेता ने कहा कि अक्टूबर 2023 में मामला फिर से मंत्रालय को भेजा गया था और उसके बाद से पंजाब सरकार को कोई प्रस्ताव प्राप्त नहीं हुआ।

पन्नू ने मुख्यमंत्री भगवंत मान द्वारा सजा में छूट के ऐसे किसी प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने से इनकार करते हुए कहा, ‘‘जब पंजाब सरकार को गृह मंत्रालय से कोई आवेदन मिला ही नहीं, तो मुख्यमंत्री किसी फाइल पर हस्ताक्षर कैसे कर सकते हैं या उसे राज्यपाल को कैसे भेज सकते हैं?’’

भाषा

सिम्मी नरेश

नरेश