(तस्वीरों के साथ)
चेन्नई, 10 मई (भाषा) सी. जोसेफ विजय जब बार-बार यह दावा कर रहे थे कि 2026 का तमिलनाडु विधानसभा चुनाव उनकी पार्टी टीवीके और सत्ता पर काबिज द्रमुक के बीच सीधी जंग है, तब बहुत से लोगों ने इसे एक फिल्मी सितारे का अति आत्मविश्वास समझकर खारिज कर दिया था, लेकिन रविवार को राजनीति की पटकथा ही बदल गयी और 51-वर्षीय विजय ने द्रविड़ राजनीति की सबसे मजबूत ताकत को शिकस्त देकर ‘रील लाइफ’ के ‘‘थलपति’’ से लेकर ‘रियल लाइफ’ के ‘‘मुथलवर’’ (मुख्यमंत्री) तक का सफर पूरा किया।
सिर्फ चुनावी मुकाबले में ही नहीं, बल्कि राजनीति करने के तरीके में भी विजय और उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) ने पारंपरिक राजनीतिक दलों से बिल्कुल अलग राह चुनी। विजय ने हर विधानसभा क्षेत्र में जाकर उम्मीदवारों का परिचय नहीं कराया, न ही पारंपरिक शैली में विशाल रैलियां कर आक्रामक प्रचार किया।
इसके बावजूद उनके संदेश सोशल मीडिया पर बार-बार साझा किए जाते रहे और उनके प्रशंसकों तथा समर्थकों ने जन-जन तक उन्हें जुबानी भी पहुंचाया।
उन्होंने संवाददाता सम्मेलनों या साक्षात्कारों से दूरी बनाए रखी और सीधे सोशल मीडिया के माध्यम से जनता से संवाद किया। खास बात यह रही कि उन्होंने युवाओं, किशोरों और बच्चों को केंद्र में रखकर प्रचार अभियान तैयार किया, ताकि वे अपने माता-पिता को टीवीके के पक्ष में मतदान के लिए प्रेरित करें।
विजय ने अपनी राजनीतिक विचारधारा में द्रविड़ चिंतन और तमिल राष्ट्रवाद का ऐसा मिश्रण तैयार किया, जिसने जनता के बड़े वर्ग को आकर्षित किया।
करीब 25-30 साल पहले शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि शर्मिला, सौम्य और मासूम-सा दिखने वाला यह युवक एक दिन राजनीतिक पार्टी बनाकर तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बनेगा। इतिहास का यह पूरा सफर मानो एक तस्वीर में सिमट आया, जब द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) के दिग्गज नेता एम. करुणानिधि के साथ पीछे खड़े बालक विजय की फोटो वायरल हुई। उस तस्वीर को देखकर लोग हैरानी से पूछने लगे कि क्या कभी पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि ने सोचा होगा कि यही लड़का एक दिन उनके बेटे स्टालिन का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और उनकी पराजय का कारण बनेगा।
फिल्म ‘पूवे उनक्कागा’ के निर्देशक विक्रमन ने हाल ही में ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मुझे तभी यकीन था कि विजय एक दिन फिल्म उद्योग पर राज करेंगे। उनमें कुछ ऐसा खास था, जो लोगों को दीवाना बना देता था।’’
‘गिल्ली’ और ‘मधुरे’ जैसी फिल्मों के संवाद लिखने वाले तथा ‘अझागिया तमिल मगन’ और ‘बैरावा’ के निर्देशक भारतन भी इस बात से सहमति जताते हैं।
‘पूवे उनक्कागा’ विजय के फिल्मी करियर की पहली बड़ी सफलता साबित हुई। इसके बाद उन्होंने भावनाओं, पारिवारिक मूल्यों, हास्य, दमदार एक्शन और सुपरहिट गीतों के मिश्रण वाले फॉर्मूले से खुद को ‘मेगास्टार’ में बदल लिया।
विजय के परिवार ने उनकी तीसरी फिल्म ‘रसिगन’ (1994) से ही उन्हें ‘‘इलैया थलपति’’ यानी ‘‘युवा कमांडर’’ का खिताब देना शुरू कर दिया था। यह उनकी अपना ‘ब्रांड’ बनाने की दूरदृष्टि का ही संकेत था। समय के साथ यही ‘‘इलैया थलपति’’ निर्विवाद ‘थलपति’ और जननायक बन गया।
अब चंद्रशेखर जोसेफ विजय ने ‘थलपति’ से आगे बढ़कर ‘थलाइवन’ (नेता) और ‘मुथलवर’ (मुख्यमंत्री) का सफर तय कर लिया है।
विजय ने बेहद योजनाबद्ध तरीके से अपने फिल्मी करियर को राजनीतिक परिवर्तन के लक्ष्य के अनुरूप ढाला।
जब 2021 के स्थानीय निकाय चुनावों में विजय मक्कल इयक्कम (वीएमआई) के बैनर तले उनके समर्थकों ने अभिनेता की तस्वीरों के साथ चुनाव जीतना शुरू किया, तभी से उनके राजनीति में कदम रखने के संकेत मिलने लगे थे। वीएमआई के कई पदाधिकारी आज टीवीके के प्रमुख नेता हैं।
वर्षों पहले जब विजय सार्वजनिक मंचों पर कहानियां सुनाने लगे, जो कभी पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय जे. जयललिता की खास शैली मानी जाती थी, तब लोगों को लगा कि वह जरूरत से ज्यादा बड़ा दांव खेल रहे हैं।
दिग्गज ‘कलैनार’ करुणानिधि जैसे करिश्माई नेताओं की तरह विजय ने भी अपने प्रशंसकों और समर्थकों से भावनात्मक जुड़ाव कायम करने के लिए एक खास संबोधन शैली अपनाई।
‘‘एन नेन्जिल कुडियिरुक्कुम… ननबा, ननबी’’ (मेरे दिल में बसने वाले दोस्तों) विजय का वह लोकप्रिय संबोधन है, जिसके जरिये वह अपने समर्थकों का अभिवादन करते हैं। जयललिता समेत कई बड़े नेताओं की तरह विजय ने भी मीडिया को बहुत कम साक्षात्कार दिए और हमेशा सार्वजनिक तौर पर कम बोलने की रणनीति अपनाई, एक ऐसी शैली, जिसे वह अब राजनीति में भी कायम रखे हुए हैं।
उनकी फिल्म ‘थलाइवा’ (द लीडर, 2013) की ‘टैगलाइन’ ‘‘नेतृत्व के लिए जन्मा’’ पहली बार उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की स्पष्ट झलक लेकर आया। हालांकि उससे पहले ही वह दिल्ली में अन्ना हजारे के अनशन स्थल पर पहुंचकर समर्थन जता चुके थे, जिसने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं को हवा दे दी थी।
‘थलाइवा’ विवादों में भी घिरी और तमिलनाडु में उसकी रिलीज दो सप्ताह तक टाल दी गई। बाद में ‘टैगलाइन’ हटाने के बाद ही फिल्म प्रदर्शित हो सकी। उस समय राज्य में अन्नाद्रमुक की सरकार थी।
फिल्म ‘काठी’ (2014) में किसानों की समस्याओं को उठाकर विजय ने अपने प्रशंसकों के बीच एक मसीहा जैसी छवि बना ली। इसके बाद उनकी फिल्मों में राजनीतिक संदेश और भी स्पष्ट होने लगे। ‘मर्सल’ (2017) में जीएसटी की आलोचना वाले संवाद ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया। भाजपा नेता एच. राजा ने विजय के ईसाई धर्म का उल्लेख करते हुए उन पर ‘‘नफरत फैलाने’’ का आरोप लगाया।
‘सरकार’ (2018) में चुनावी राजनीति और मतदान में धांधली का मुद्दा उठाया गया, जिससे उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें और तेज हो गईं। वर्ष 2018 के तूतीकोरिन पुलिस गोलीबारी कांड के बाद विजय ने पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर प्रत्येक को एक लाख रुपये की सहायता दी।
उनके सार्वजनिक मंचों पर दिए गए संदेश – ‘‘उसुप्पेथुरवन्किट्टा उम्मुनुम…’’
यानी ‘‘उकसाने वालों को नजरअंदाज करो और शांत रहो’’, लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हुए।
उनकी फिल्मों के संवाद भी कुछ ऐसे थे, जो लोगों की स्मृतियों में हमेशा के लिए दर्ज हो गए। ‘थुप्पाक्की’ और बाद में ‘काठी’ में बड़े एक्शन दृश्य से ठीक पहले बेहद शांत लेकिन तीखे अंदाज में बोला गया संवाद ‘‘आई एम वेटिंग… (मैं इंतजार कर रहा हूं)’’, ने उनकी लोकप्रियता और व्यक्तित्व को एक अलग मुकाम तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
विजय पहली बार 1984 में फिल्म ‘वेत्री’ में बाल कलाकार के रूप में पर्दे पर नजर आए। इस फिल्म में अभिनेता विजयकांत मुख्य भूमिका में थे और इसका निर्देशन विजय के पिता एस. ए. चंद्रशेखर ने किया था। अठारह वर्ष की उम्र में विजय ने ‘नालैया थीरपू’ (1992) से बतौर मुख्य अभिनेता पदार्पण किया, लेकिन फिल्म असफल रही। इसके बाद अपनी दूसरी फिल्म ‘सेंधूरापांडी’ (1993) में उन्होंने विजयकांत के छोटे भाई की भूमिका निभाई। विजयकांत की जबरदस्त लोकप्रियता ने इस फिल्म की व्यावसायिक सफलता में अहम भूमिका निभाई। एक्शन और रोमांस से भरपूर इस फिल्म की कहानी गांव वालों के सामंती शोषण के खिलाफ संघर्ष पर आधारित थी।
निस्संदेह, विजय के पास करिश्मा भी है और दृढ़ विश्वास भी। यही वजह है कि वह पर्दे की नायकत्व वाली छवि को वास्तविक राजनीतिक नेतृत्व में बदलने में कामयाब रहे। उनकी कहानी यह भी बताती है कि किसी ‘थलपति’ को ‘मुथलवर’ बनने के लिए सिर्फ लोकप्रियता नहीं, बल्कि सही समय, सही मार्गदर्शन, रणनीतिक धैर्य और निर्णायक कदमों की भी जरूरत होती है।
भाषा गोला सुरेश
सुरेश