नयी दिल्ली, 25 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को इस बात पर जोर दिया कि लड़कियों के सामने सिर्फ़ इसलिए पढ़ाई छोड़ने की स्थिति नहीं आनी चाहिए कि स्कूलों में सैनिटरी नैपकिन और अलग से शौचालय नहीं हैं। न्यायालय ने केंद्र से इस बारे में उसके निर्देशों का पूरी तरह से पालन सुनिश्चित करने को कहा।
उच्चतम न्यायालय का यह बयान तब आया जब केंद्र ने कहा कि 30 जनवरी को दिए गए उसके फैसले, जिसमें अधिकारियों को लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन और बालिकाओं के लिए अलग से शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराने को कहा गया था, से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कोशिशों में तेजी आई है।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा, ‘‘इसे अच्छी तरह लागू करें। यह इस देश की महिलाओं और लड़कियों की भलाई के लिए है। लड़कियों को सिर्फ़ इस वजह से पढ़ाई नहीं छोड़नी चाहिए और घर पर बैठकर कुछ घरेलू काम नहीं करने चाहिए।’’
पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे से कहा, ‘‘अब, यह आप पर है कि आप इसे अच्छी तरह लागू कराएं और देखें कि जहां तक हो सके, हमारे फ़ैसले के हिसाब से लाभ पहुंचाए जाएं।’’
लैंगिक न्याय और शैक्षिक समानता लाने के लिए 30 जनवरी को दिए गए ऐतिहासिक फैसले में, उच्चतम न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को लड़कियों को निशुल्क ‘ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल’ सैनिटरी नैपकिन और स्कूलों में सभी विद्यार्थियों के लिए लैंगिक आधार पर अलग-अलग शौचालय उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था।
इसने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को कई निर्देश जारी किए थे ताकि स्कूलों में ये सुविधाएं प्रदान की जाएं, चाहे वे सरकारी हों, सहायता प्राप्त हों या निजी हों।
पीठ ने कहा, ‘‘केंद्र को इस बारे में सभी राज्यों को निर्देश देते रहना चाहिए। केंद्र को समय-समय पर सभी राज्यों से हमारे निर्देशों का सही तरीके से पालन करने के लिए ज़रूरी डेटा और जानकारी इकट्ठा करते रहना चाहिए।’’
शीर्ष न्यायालय ने कहा कि वह हर तीन महीने में निर्देशों के पालन की निगरानी करता रहेगा।
भाषा वैभव माधव
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