नीट प्रश्नपत्र लीक प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ प्राथमिकी वापस ले सकती हैं सरकारें : न्यायालय

Ads

नीट प्रश्नपत्र लीक प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ प्राथमिकी वापस ले सकती हैं सरकारें : न्यायालय

  •  
  • Publish Date - August 3, 2026 / 04:59 PM IST,
    Updated On - August 3, 2026 / 04:59 PM IST

नयी दिल्ली, तीन अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को स्पष्ट किया कि दिल्ली और अन्य राज्यों की सरकारें राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) प्रश्नपत्र लीक के विरोध में प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को कानून के अनुसार बंद कर सकती हैं या उन्हें वापस ले सकती हैं, बशर्ते उनका गंभीर और जघन्य अपराधों का कोई ‘‘आपराधिक रिकॉर्ड’’ नहीं हो।

न्यायालय का यह स्पष्टीकरण केंद्र सरकार के उस बयान के बाद आया है जिसमें केंद्र ने कहा था कि वह नीट प्रश्नपत्र लीक के विरोध में दिल्ली में 20 जुलाई को हुए ‘संसद मार्च’ समेत अन्य प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं करने को लेकर ‘‘गंभीर’’ है, बशर्ते उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं हो।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी जिनमें ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (कॉजपा) के नेतृत्व में हुए आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों का आरोप लगाया गया था।

अदालत ने कहा, ‘‘यह स्पष्ट किया जाता है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीटी) दिल्ली और कोई भी अन्य राज्य सरकार प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को बंद करने या वापस लेने के लिए स्वतंत्र होंगी… बशर्ते कि उनका ‘आपराधिक रिकॉर्ड’ नहीं हो। यहां ‘‘आपराधिक रिकॉर्ड’’ से आशय सिर्फ गंभीर और जघन्य अपराधों से है।

मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शुरुआत में शीर्ष अदालत को बताया कि छात्रों के खिलाफ प्राथमिकी वापस लेने के संबंध में केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता को लागू करने के तरीके को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति थी।

मेहता ने कहा, ‘‘प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी के संबंध में क्या किया जाना चाहिए, इसे लेकर कुछ भ्रम की स्थिति थी। मुझे अदालत को यह सूचित करने का निर्देश दिया गया है कि है कि सरकार अपनी इस प्रतिबद्धता को लेकर गंभीर है। जिन लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड रहा है… उन्हें छोड़कर, बाकी सभी मामलों का समाधान किया जा सकता है।’’

उन्होंने कहा कि गंभीर और जघन्य अपराधों में शामिल 2,700 से अधिक लोगों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी वापस नहीं ली जाएंगी।

मेहता ने कहा कि उन्होंने इस प्रतिबद्धता को लागू करने के लिए कानूनी प्रक्रिया को लेकर वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर से चर्चा की है। ग्रोवर ने कहा कि मुद्दा यह था कि मामलों को वापस लिया जाए या प्राथमिकी को रद्द किया जाए।

उन्होंने कहा, ‘‘यह शिक्षा व्यवस्था में सुधार के बारे में था। ये युवा लोग हैं जिनके सामने पूरी जिंदगी पड़ी है। अगर प्राथमिकी रद्द भी की जाएगी तो बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में कई प्राथमिकी दर्ज हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘राज्यों के साथ इस पर काम करने के बाद हम फिर से इस अदालत का रुख करेंगे।’’ उन्होंने कहा कि अलग-अलग सरकारी वकीलों से मामले बंद करने के लिए कहना एक लंबा और अनिश्चित प्रक्रिया है।

वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने बताया कि प्रदर्शनों के दौरान वकीलों के बच्चों को भी पीटा गया था।

उन्होंने कहा, ‘‘वीडियो बेहद चौंकाने वाले हैं। हमने अदालत को 300 वीडियो सौंपे हैं। चूंकि ऊपर से निर्देश आए हैं, इसलिए पुलिस आयुक्त को इन सब पर ध्यान देना चाहिए।’’

शंकरनारायणन ने कहा, ‘‘हमने बिना वर्दी वाले उन लोगों की पहचान की है, जो कथित पुलिस ज्यादती में शामिल थे। पुलिस आयुक्त और आरएएफ (त्वरित कार्य बल) निदेशक को यह बताने का निर्देश दिया जाना चाहिए कि पुलिस ने पैलेट गन आदि का इस्तेमाल क्यों किया।’’

शंकरनारायणन ने कहा कि पुलिस को मनमाने ढंग से कार्रवाई करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

शंकरनारायणन ने कहा, ‘‘हमने (अदालत को) वीडियो दिखाए हैं। हम इस गंभीर मामले की ओर अदालत का ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं। हलफनामे में इन सवालों के जवाब दिए जाएं। जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।’’

वरिष्ठ वकील अभिषेक सिंघवी ने कहा कि ‘‘आपराधिक रिकॉर्ड’’ शब्द का आशय स्पष्ट करने की जरूरत है क्योंकि छात्रों पर यातायात नियम तोड़ने, छोटे-मोटे अपराध या राजनीतिक कारणों से दर्ज मामले हो सकते हैं।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘जरूरत से अधिक बल प्रयोग करने वाले पुलिस अधिकारी को बेवजह सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए और ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि छात्र प्रदर्शन की आड़ में किसी गंभीर अपराधी को सुरक्षा मिल जाए।’’

पैलेट गन के इस्तेमाल पर ग्रोवर ने कहा कि दिल्ली पुलिस का ऐसा कोई स्थायी आदेश नहीं है जो इनके इस्तेमाल की इजाजत देता हो।

उन्होंने कहा, ‘‘याचिका (पैलेट गन के बारे में) यह नहीं कह रही है कि पुलिस के पास अपनी सुरक्षा के लिए कोई साधन नहीं होना चाहिए। लेकिन यह विशेष हथियार इस्तेमाल के लिए उपयुक्त नहीं है।’’

न्यायालय ने कहा कि वह पैलेट गन के इस्तेमाल के लिए एक प्रोटोकॉल बनाना चाहता है और मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त को तय की।

शीर्ष अदालत ने इससे पहले कहा था कि सिर्फ इसलिए पुलिस की ज्यादती या ‘लाठीचार्ज’ को सही नहीं ठहराया जा सकता कि कोई आंदोलन हो रहा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार पूरी तरह से सुनिश्चित है।

दिल्ली में 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में निकाले गए मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़पें हुई थीं। संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाकर्मियों ने लाठियों और आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल किया था।

भाषा सुरभि रंजन

रंजन