ग्रेट निकोबार परियोजना रणनीतिक हितों के लिए अहम, आलोचक ‘भौगोलिक अज्ञानता’ से ग्रस्त: सरकारी सूत्र

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ग्रेट निकोबार परियोजना रणनीतिक हितों के लिए अहम, आलोचक ‘भौगोलिक अज्ञानता’ से ग्रस्त: सरकारी सूत्र

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  • Publish Date - June 8, 2026 / 11:41 PM IST,
    Updated On - June 8, 2026 / 11:41 PM IST

नयी दिल्ली, आठ जून (भाषा) भारत अपने रणनीतिक समुद्री और आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना पर काम कर रहा है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने सोमवार को यह बात कही। उन्होंने परियोजना के आलोचकों को “भौगोलिक अज्ञानता” से ग्रस्त करार दिया।

केंद्र सरकार ग्रेट निकोबार द्वीप समूह (जीएनआई) परियोजना के तहत एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (आईसीटीपी), एक नागरिक-सह-नौसेना हवाई अड्डा, एक टाउनशिप और एक विद्युत संयंत्र के निर्माण की योजना बना रही है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पिछले शुक्रवार को कहा था कि सरकार का यह तर्क “झूठा” है कि ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना का संबंध रक्षा और माल ढुलाई क्षेत्र से है। उन्होंने आरोप लगाया था कि यह परियोजना वास्तव में एक व्यवसायी को लाभ पहुंचाने के लिए है, ताकि वह भारत की सबसे अमूल्य पारिस्थितिक भूमि पर होटल और कैसीनो बना सके।

राहुल ने अप्रैल में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की अपनी यात्रा का 15 मिनट का एक वीडियो भी साझा किया। उन्होंने लोगों से मोदी सरकार को यह बताने के लिए एक ऑनलाइन याचिका पर हस्ताक्षर करने का आग्रह किया कि “हम ‘ग्रीड’ (लालच) के बजाय ‘ग्रीन’ (हरित क्षेत्र) को चुनते हैं।”

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि भू-राजनीतिक माहौल को देखते हुए यह परियोजना एक रणनीतिक आवश्यकता है और सरकार इस स्थान का लाभ उसी तरह उठाना चाहती है, जिस तरह सिंगापुर ने प्रमुख बुनियादी ढांचे और आपूर्ति शृंखला के निर्माण के लिए अपने भौगोलिक लाभ का इस्तेमाल किया है।

सूत्रों के मुताबिक, इस क्षेत्र में हाइड्रोकार्बन के आशाजनक भंडार हैं और जब तक “यहां हमारी स्थायी उपस्थिति नहीं होगी, तब तक इसका लाभ उठाना संभव नहीं होगा।”

बताया जा रहा है कि परियोजना के तहत ग्रीनफील्ड हवाईअड्डे के निर्माण में रक्षा मंत्रालय लगभग 13,000 करोड़ रुपये का योगदान देगा, जबकि बाकी लागत नागरिक उड्डयन मंत्रालय वहन करेगा।

सूत्रों ने कहा कि यह हवाईअड्डा भारत की समुद्री जागरूकता (एमडीए) और परिचालन पहुंच को इस कदर बढ़ाएगा, जो अकेले किसी मौजूदा रक्षा सुविधा के विस्तार से पूरी तरह से हासिल नहीं किया जा सकता है।

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) ने इस हवाईअड्डे की परिकल्पना की है, जिसके 2040 तक प्रति वर्ष औसतन 13 लाख यात्रियों को आकर्षित करने का अनुमान है।

सूत्रों के अनुसार, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में स्थित भारतीय नौसैनिक हवाईअड्डे ‘आईएनएस बाज’ का रनवे जीएनआई परियोजना का हिस्सा नहीं होगा।

उन्होंने कहा कि जीएनआई विकास परियोजना भारत के समुद्री हितों की रक्षा के लिए तैयार की गई रणनीतिक रूप से अहम राष्ट्रीय पहल है।

सूत्रों ने कहा कि यह सुझाव कि ग्रेट निकोबार परियोजना में भारत की रणनीतिक आवश्यकताओं को केवल मौजूदा रक्षा संपत्तियों का विस्तार करके पूरा किया जा सकता है, परियोजना और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री शक्ति की प्रकृति की “अधूरी समझ” को दर्शाता है।

सूत्रों के मुताबिक, जीएनआई में संयुक्त उपयोगकर्ता ग्रीनफील्ड और नौसैनिक हवाई अड्डा उपस्थिति बनाए रखने, अभियानों का समर्थन करने, संकटों का जवाब देने और एक अग्रिम मोर्चे पर आपूर्ति शृंखला बनाए रखने की क्षमता को भी बढ़ावा देता है।

सूत्रों ने कहा कि ग्रेट निकोबार मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी मार्गों पर नियंत्रण रखता है, जहां से वैश्विक समुद्री व्यापार का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। उन्होंने कहा कि युद्धपोतों की विश्वसनीय स्थायी उपस्थिति और हवाई संसाधनों का संयोजन निगरानी के लिए रणनीतिक महत्व रखता है।

सूत्रों ने क्षेत्र के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि चीन में 80 फीसदी कच्चे तेल और 70 प्रतिशत एलएनजी का आयात मलक्का जलडमरूमध्य के रास्ते होता है।

भाषा पारुल संतोष

संतोष