गांधीनगर, 28 फरवरी (भाषा) गुजरात विधानसभा में शनिवार को विपक्षी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) के विधायकों ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं को लेकर चिंता जताईं।
विपक्ष ने मतदाता सूची पुनरीक्षण के लिए इस वित्तीय वर्ष में किए गए व्यय को अधिकृत करने के लिए पेश विनियोग विधेयक पर सदन में चर्चा के दौरान मतदाता सूचियों से नाम हटाने के लिए बड़े पैमाने पर फॉर्म-7 दाखिल करने का मुद्दा उठाया, जो कथित तौर पर संबंधित मतदाताओं की जानकारी के बिना विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में दाखिल किए जा रहे थे।
बहस की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार द्वारा राज्य में एसआईआर से संबंधित कार्यों पर किए गए व्यय की राशि राजकोष से आवंटित करने के लिए विनियोग विधेयक पेश किये जाने के साथ शुरू हुई।
विधानसभा अध्यक्ष शंकर चौधरी ने कांग्रेस के दो विधायकों और आम आदमी पार्टी के एक विधायक को विधेयक पर बोलने की अनुमति दे दी थी, लेकिन गुजरात के वन और पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने व्यवस्था का प्रश्न उठाते हुए दलील दी कि भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) से संबंधित मामलों पर राज्य विधानसभा में चर्चा नहीं की जा सकती है।
मोढवाडिया ने संविधान के अनुच्छेद 324 का हवाला देते हुए कहा कि निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय है, जो लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार है और राज्य सरकार को मतदाता सूची तैयार करने या उसमें संशोधन करने सहित इसकी प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।
उन्होंने दलील दी कि यद्यपि राज्य तंत्र चुनाव संबंधी कार्यों का निष्पादन करता है, लेकिन लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुसार वह पूरी तरह से निर्वाचन आयोग के नियंत्रण में ही ऐसा करता है।
मोढवाडिया ने इसी के साथ विधानसभा अध्यक्ष से विपक्षी सदस्यों को इस मुद्दे पर अपनी बात रखने की दी गई सहमति वापस लेने की मांग की।
भाजपा विधायक एवं पूर्व विधानसभा अध्यक्ष रमनलाल वोरा ने व्यवस्था के प्रश्न का समर्थन करते हुए दोहराया कि यद्यपि कर्मचारी राज्य के हैं, लेकिन उनके चुनाव संबंधी कर्तव्य सीधे निर्वाचन आयोग के नियंत्रण में किए जाते हैं, और इसलिए विधानसभा उन प्रक्रियाओं पर सवाल उठाने के लिए उपयुक्त मंच नहीं है।
हालांकि, कांग्रेस और आप के सदस्यों ने चर्चा को रोकने के इस कदम का विरोध किया।
कांग्रेस विधायक किरिट पटेल ने कहा कि हालांकि विधानसभा निर्वाचन आयोग के स्वतंत्र निर्णयों या अदालतों में लंबित मामलों पर सवाल नहीं उठा सकती, लेकिन प्रशासनिक खामियों के वैसे मामलों पर बहस होनी चाहिए, जहां राज्य सरकार जिम्मेदार है।
कांग्रेस विधायक अमित चावडा ने कहा कि लोकतंत्र में मतदान के संवैधानिक अधिकार की रक्षा सर्वोपरि है।
उन्होंने कहा, ‘‘चूंकि बूथ स्तर के अधिकारियों से लेकर चुनाव अधिकारियों तक जमीनी स्तर की मशीनरी राज्य सरकार की होती है, इसलिए इस सदन को मतदाता सूची तैयार करने में हुई त्रुटियों और अन्य प्रशासनिक खामियों की जांच करनी चाहिए।’’
कांग्रेस विधायक शैलेश परमार ने दावा किया कि चूंकि एसआईआर के लिए राज्य के खजाने से धन का उपयोग किया जा रहा है, इसलिए विधानसभा को इस बात पर बहस करने का अधिकार है कि पैसा कैसे खर्च किये जा रहे हैं।
विधानसभा अध्यक्ष ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद व्यवस्था दी कि उन्होंने पिछले रिकॉर्ड की समीक्षा की है और पाया है कि पूरक मांगों पर इसी तरह की चर्चा की अनुमति पूर्व अध्यक्षों द्वारा भी दी गई थी।
उन्होंने अपने फैसले में कहा कि अनुच्छेद 324 के तहत, निर्वाचन आयोग स्वायत्त है और विधानसभा एसआईआर प्रक्रिया सहित इसके वैधानिक और संवैधानिक कर्तव्यों पर चर्चा नहीं कर सकती है।
चौधरी ने, हालांकि स्पष्ट किया कि सदस्यों को पूरक मांगों और इस प्रक्रिया को लागू करने में शामिल राज्य तंत्र की प्रशासनिक खामियों पर चर्चा करने की अनुमति है।
उन्होंने आगाह किया कि राज्य प्रशासन की आलोचना करने और निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता पर हमला करने के बीच एक ‘पतली रेखा’ है और सदस्यों को इसे पार न करने की चेतावनी दी।
पीठ से अनुमति मिलने के बाद, आम आदमी पार्टी के विधायक चैतर वासावा ने आरोप लगाया कि 17 और 18 जनवरी के आसपास विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में पंजीकृत मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए अचानक हजारों फॉर्म-7 जमा कराए गए।
उन्होंने दावा किया कि ऐसे कई आवेदन सहायक दस्तावेजों के बिना दायर किए गए थे और जिन व्यक्तियों के नाम प्रपत्रों पर दिखाई दिए थे, उनसे उनकी टीम द्वारा संपर्क किए जाने पर उन्होंने आवेदन जमा करने से इनकार कर दिया था।
कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवाणी ने बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा तैयार संविधान का हवाला देते हुए दावा किया कि मतदान एक मौलिक अधिकार है।
मेवाणी ने आरोप लगाया, ‘‘एक पूर्व नियोजित रणनीति के तहत, गुजरात में एक विशेष समुदाय से संबंधित लगभग 14 लाख लोगों के नाम हटाने का प्रयास किया गया। ऐसे कृत्य गुजरात में सामाजिक सद्भाव को नष्ट कर देंगे। राज्य सरकार को इन फर्जी फॉर्म-7 के पीछे के लोगों की पहचान करनी चाहिए, प्राथमिकी दर्ज करनी चाहिए और उन्हें जेल भेजना चाहिए।’’
उन्होंने दावा किया कि गैर अधिसूचित जनजातियां (डीएनटी) और खानाबदोश समुदाय, जिनके पास स्थायी पते नहीं हैं, एक भी दस्तावेज़ के अभाव में मतदान के अधिकार खो सकते हैं।
कांग्रेस विधायक अमृतजी ठाकोर ने दावा किया कि चुनाव अधिकारी संशोधित मतदाता सूची में नाम दर्ज करने के लिए आधार कार्ड या यहां तक कि मतदाता पहचान पत्र (ईपीआईसी) कार्ड को भी वैध दस्तावेज के रूप में स्वीकार नहीं कर रहे हैं।
ठाकोर ने फॉर्म-7 के माध्यम से नामों को हटाने के मुद्दे पर कहा कि नागरिकों को यह जानने का लोकतांत्रिक अधिकार है कि कौन ‘‘गुप्त रूप से उनके खिलाफ ये फॉर्म भरकर उनके मतदान के अधिकार को छीनने की सक्रिय रूप से कोशिश कर रहा है’’।
चर्चा का जवाब देते हुए वित्त मंत्री कनुभाई देसाई ने कहा कि फॉर्म-7 नाम हटाने की निर्धारित प्रक्रिया है, लेकिन इसे जमा करने मात्र से किसी का नाम नहीं हटाया जाता। उन्होंने कहा कि बूथ स्तर के अधिकारी अनिवार्य रूप से मौके पर सत्यापन करते हैं और यदि आवश्यक हो तो अंतिम निर्णय से पहले सुनवाई की जाती है।
भाषा धीरज सुरेश
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