सजा कम करने का उच्च न्यायालय का फैसला निरस्त, शीर्ष न्यायालय ने कहा- बेवजह सहानुभूति अनुचित

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सजा कम करने का उच्च न्यायालय का फैसला निरस्त, शीर्ष न्यायालय ने कहा- बेवजह सहानुभूति अनुचित

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  • Publish Date - April 4, 2023 / 06:25 PM IST,
    Updated On - April 4, 2023 / 06:25 PM IST

नयी दिल्ली, चार अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने जल्दबाजी और लापरवाही के कारण एक व्यक्ति की मौत के मामले में दोषी को मिली सजा कम करने का पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का फैसला निरस्त कर दिया और कहा कि आरोपी के पक्ष में ‘अनावश्यक सहानुभूति’ दिखाना चिरस्थायी नहीं है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय ने इस बात पर बिल्कुल विचार नहीं किया कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) प्रकृति में दंडात्मक और (अपराध के प्रति) हतोत्साहित करने वाली है तथा इसका मुख्य उद्देश्य संहिता के तहत किए गए अपराधों के लिए अपराधियों को दंडित करना है।

शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ पंजाब सरकार की ओर से दायर एक अपील पर अपना फैसला सुनाया, जिसमें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304-ए (लापरवाही के कारण मौत) के तहत एक आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया था लेकिन उसकी दो वर्ष की सजा कम करके आठ महीने कर दी गयी थी। उच्च न्यायालय की सजा मृतक के परिवार को 25 हजार रुपये का भुगतान किये जाने पर मान्य होगी।

न्यायमूर्ति एम. आर. शाह और न्यायमूर्ति सी. टी. रविकुमार की पीठ ने 28 मार्च के अपने फैसले में कहा कि उच्च न्यायालय ने सजा को कम करते समय अपराध की गंभीरता पर विचार नहीं किया था।

अभियुक्त के लापरवाही से एसयूवी चलाने के कारण एंबुलेस में सवार एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और दो घायल हो गए थे।

पीठ ने कहा, ‘उच्च न्यायालय ने इस मामले में तथ्यों की उचित समीक्षा नहीं की और इस तथ्य पर विचार नहीं किया कि एसयूवी की टक्कर के कारण एम्बुलेंस पलट गई।’’

सड़क दुर्घटना जनवरी 2012 में उस वक्त हुई थी, जब एसयूवी में सवार आरोपी ने चंडीगढ़ से मोहाली की ओर आ रही एक एंबुलेंस को टक्कर मार दी थी।

पीठ ने सजा कम करने के उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द कर दिया और निचली अदालत की ओर से दी गई सजा बहाल कर दी।

अपील की अनुमति देते हुए, न्यायालय ने अभियुक्त को शेष सजा काटने के लिए आत्मसमर्पण करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया।

भाषा सुरेश पवनेश

पवनेश