आईआईटी-कानपुर के वैज्ञानिकों ने पल्सर दूरी मापने की नयी विधि विकसित की

आईआईटी-कानपुर के वैज्ञानिकों ने पल्सर दूरी मापने की नयी विधि विकसित की

आईआईटी-कानपुर के वैज्ञानिकों ने पल्सर दूरी मापने की नयी विधि विकसित की
Modified Date: February 26, 2026 / 12:12 am IST
Published Date: February 26, 2026 12:12 am IST

कानपुर, 25 फरवरी (भाषा) भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी)-कानपुर के भौतिकी विभाग और एसपीएएसई तथा राष्ट्रीय रेडियो खगोल भौतिकी केंद्र (एनसीआरए) के वैज्ञानिकों ने पल्सर (ऐसे तारे जो आवधिक रेडियो फ्लैश उत्सर्जित करते हैं) की दूरी का अनुमान लगाने के लिए एक नयी विधि विकसित की है।

ये निष्कर्ष ‘मंथली नोटिस ऑफ द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी’ नामक पत्रिका में प्रकाशित ‘पल्सर ऑब्जर्वेबल्स और एक नवीन दूरी अनुमान विधि का उपयोग करके गम नेबुला की आकृति विज्ञान की जांच’ शीर्षक वाले एक हालिया शोध पत्र में प्रकाशित किए गए हैं।

खगोल विज्ञान में तारों की सटीक दूरी मापना अब भी एक बड़ी चुनौती है। वैज्ञानिक आकाश में किसी वस्तु की स्थिति तो सटीकता से निर्धारित कर लेते हैं, लेकिन उसकी दूरी का आकलन करना जटिल बना रहता है। त्रिकोणमितीय पैरालैक्स जैसी प्रत्यक्ष तकनीक केवल अपेक्षाकृत निकटवर्ती तारों पर ही प्रभावी होती है, जबकि न्यूट्रल हाइड्रोजन अवशोषण आधारित अन्य विधियों में काफी अनिश्चितता बनी रहती है।

यह नयी विधि पल्सर संकेतों द्वारा अंतरतारकीय माध्यम से यात्रा करते समय अनुभव किए जाने वाले दो स्वतंत्र रेडियो तरंग प्रभावों को मिलाकर इन सीमाओं का समाधान करती है : फैलाव माप (डीएम) और प्रकीर्णन प्रसार।

यह शोध डॉ. आशीष कुमार (वर्तमान में एनसीआरए-पुणे), प्रो. अविनाश ए. देशपांडे (पूर्व संकाय, आरआरआई बेंगलुरु) और प्रो. पंकज जैन (आईआईटी-कानपुर) द्वारा किया गया।

भाषा

सं, किशोर, जफर रवि कांत


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