नयी दिल्ली, 22 मार्च (भाषा) विपक्षी सांसदों द्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग करते हुए संसद में दिए गए नोटिसों में उन पर ‘‘सरकार के इशारे पर काम करने’’ और एसआईआर प्रक्रिया के माध्यम से ‘‘बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित करने’’ का भी आरोप लगाया गया है।
विपक्षी सदस्यों ने कुमार की नियुक्ति पर भी सवाल उठाए हैं।
संसद के दोनों सदनों में 12 मार्च को प्रस्तुत किए गए नोटिसों में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) के खिलाफ ‘‘साबित कदाचार’’ के आधार पर सात आरोप सूचीबद्ध किए गए हैं, जिनमें उन्हें पद से हटाने का आह्वान किया गया है।
लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 विपक्षी सांसदों ने सीईसी को हटाने की मांग का प्रस्ताव किया है।
इन नोटिस के बारे में पूछे जाने पर राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि विपक्षी सांसद इन पर कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं।
ओ’ब्रायन ने कहा, ‘‘अगर केंद्र सरकार इन नोटिसों पर कार्रवाई नहीं करती है, तो कार्यपालिका और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के बीच मिलीभगत को लेकर संदेह पैदा होगा।’’
‘सिद्ध कदाचार’ के आरोपों में विपक्ष ने सीईसी पर ‘‘स्वतंत्रता और संवैधानिक निष्ठा बनाए रखने में विफल रहने’’ और ‘‘सरकार के इशारे पर काम करने’’ का आरोप लगाया है।
विपक्ष के आरोपों में कुमार की मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में नियुक्ति की प्रक्रिया के अलावा 17 अगस्त, 2025 को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को निशाना बनाते हुए उनकी ‘‘पक्षपातपूर्ण’’ प्रेस वार्ता और विपक्षी सदस्यों के साथ ‘‘भेदभावपूर्ण व्यवहार’’, जांच में ‘बाधा डालना’, ‘पारदर्शिता के साधन (टूल्स)’ उपलब्ध कराने से इंकार करना शामिल हैं।
विपक्ष का यह भी आरोप है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कवायद का क्रियान्वयन ‘‘सत्ताधारी पार्टी के राजनीतिक उद्देश्यों के अनुरूप’’ किया गया।
विपक्ष ने आरोप लगाया है कि बिहार में पिछले साल विधानसभा चुनावों से महज पांच महीने पहले एसआईआर कवायद की घोषणा की गई और ‘‘ऐसे दस्तावेजीकरण आवश्यकताओं’’ को लागू किया, जिसका प्रभाव समाज के सबसे कमजोर वर्गों को ‘‘व्यवस्थित रूप से मताधिकार से वंचित’’ करने के रूप में सामने आया।
विपक्ष ने बिहार में मतदाता सूचियों से बाहर किए गए 65 लाख मतदाताओं का हवाला देते हुए कहा कि यह ‘‘एक चौंका देने वाला आंकड़ा है, जो राज्य के मतदाताओं के एक महत्वपूर्ण हिस्से को दर्शाता है।’’
विपक्ष का दावा है कि इस प्रक्रिया ने विधानसभा चुनावों में राजग की जीत में निर्णायक भूमिका निभाई।
नोटिस में दावा किया गया था कि ‘बिहार मॉडल’ को अन्य राज्यों और पश्चिम बंगाल में भी अपनाया गया है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है। इसका मतलब है कि उन्हें केवल साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही पद से हटाया जा सकता है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है और इसे विशेष बहुमत से पारित करने की जरूरत होती है जिसमें सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून के अनुसार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी तरीके और आधार पर पद से हटाया जा सकता है, जिस तरह से उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को पद से हटाया जा सकता है।
दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद, लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति द्वारा संयुक्त रूप से एक समिति का गठन किया जाएगा।
इस समिति में प्रधान न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय के कोई न्यायाधीश, 25 उच्च न्यायालयों में से किसी एक के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे।
समिति की कार्यवाही किसी अदालती कार्यवाही की तरह होती है, जिसमें गवाहों और आरोपियों से जिरह की जाती है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त को भी समिति के समक्ष अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा।
भाषा शफीक दिलीप
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