तिरुवनंतपुरम: Kerala Elections 2026 चुनाव आयोग ने रविवार को असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव का ऐलान कर दिया। तमिलनाडु में 23 अप्रैल, केरल, असम और पुडुचेरी में 9 अप्रैल को मतदान होगा। वहीं बंगाल में दो फेज 23 और 29 अप्रैल को वोटिंग होगी। इसी के साथ ही चुनावी प्रदेशों में सियासत गर्म हो गई है। सभी पार्टी अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए गुणा-गणित लगा रहे हैं। केरल की बात करें तो सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ), कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) और भाजपा के लिए नौ अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव में मजबूती, कमजोरी, अवसर और चुनौतियां (एसडब्ल्यूओटी) कई है। एक खबर में एक-एक कर समझते हैंः-
सबसे पहले बात भाजपा की कर लेते हैं। भाजपा की मजबूती के रूप में देखें तो तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने उसके कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि का लाभ भी पार्टी को मिल सकता है। भाजपा ने चुनाव प्रचार अभियान पहले ही तेज कर शुरुआती बढ़त दिखायी है। वहीं कमजोरी को देखें तो केरल में भाजपा की चुनावी हार का लंबा इतिहास तथा राज्य में सत्तारूढ़ माकपा और विपक्षी कांग्रेस के प्रभुत्व वाली पारंपरिक द्विध्रुवीय राजनीति का चक्र तोड़ना कठिन काम है। भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा कथित तौर पर राज्य के लिए आवंटन में कटौती करने और हाल के केंद्रीय बजट में केरल को कोई भी बड़ी परियोजना प्रदान न करने को लेकर आलोचना हो रही है।
Kerala Elections 2026 विशेषकर शहरी मतदाताओं, युवाओं और कुछ सामुदायिक समूहों के बीच समर्थन धीरे-धीरे बढ़ने से पार्टी की संभावनाएं बेहतर हो सकती हैं। पार्टी नेताओं का मानना है कि मोदी सरकार के तहत सुशासन और अवसंरचना विकास, साथ ही केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी ढंग से जनता के बीच पहुंचा कर मतदाताओं को आकर्षित किया जा सकता है। भाजपा ने हालांकि कुछ वर्गों में पैठ बना ली है, लेकिन वह अब भी उन विविध समूहों के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रही है जो पारंपरिक रूप से एलडीएफ और यूडीएफ का समर्थन करते हैं।
केरल में सत्तारूढ़ एलडीएफ लगातार तीसरी जीत के लिए मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के मजबूत नेतृत्व, हाल ही में घोषित कल्याणकारी उपायों और युवाओं के बीच अपने मजबूत कैडर आधार पर भरोसा कर रही है। वहीं शबरिमला सोना चोरी मामले को लेकर विपक्ष राज्य सरकार पर हमलावर है, जिनमें कुछ वरिष्ठ माकपा नेताओं पर आरोप लगे हैं और उन्हें गिरफ्तार भी किया गया है। पिछले साल स्थानीय निकाय चुनावों से ठीक पहले मतदाताओं को कल्याणकारी उपायों से लुभाने के लिए एलडीएफ के प्रयास विफल रहे। एलडीएफ असंतोष और दलबदल की समस्या से जूझ रहा है। कई वरिष्ठ नेता कांग्रेस और भाजपा में शामिल हुए हैं।
वामपंथी दल शबरिमला सोना चोरी मामले में आरोपियों के कांग्रेस के कई नेताओं से कथित तौर पर संबंध होने का मामला चुनाव प्रचार में उछाल सकते हैं। कांग्रेस से निष्कासित विधायक राहुल ममकुटाथिल से जुड़े यौन उत्पीड़न के मामले को लेकर वामपंथी दल राष्ट्रीय पार्टी को निशाना बना सकते हैं। ‘पीएम श्री’ योजना, नए श्रम संहिता और पलक्कड़ में एक डिस्टिलरी की मंजूरी जैसे विभिन्न मुद्दों पर माकपा और उसके सहयोगी भाकपा के बीच मतभेद एलडीएफ की चुनावी संभावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं।
एलडीएफ सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) के लिए सबसे बड़ा फायदा साबित हो सकती है, जो 2024 के लोकसभा चुनावों और पिछले साल के नगर निगम चुनावों में स्पष्ट रूप से दिखाई दी थी। यूडीएफ ने 2021 से अब तक हुए पांच विधानसभा उपचुनावों में से चार में जीत हासिल की है। केरल में वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के बीच गुटबाजी से यूडीएफ को नुकसान हो सकता है। कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी ने केरल की अपनी हालिया यात्रा के दौरान एक कार्यक्रम में खुले तौर पर कहा था कि पार्टी के सभी नेताओं को मिलकर काम करना चाहिए। एलडीएफ की तरफ से मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा पेश नहीं किया गया है।
आगामी चुनावों में मुस्लिम और ईसाई वोट यूडीएफ के साथ जा सकते हैं। राज्य में भाजपा की बढ़ती ताकत को देखते हुए, यूडीएफ को उम्मीद होगी कि राजग हिंदू वोटों को विभाजित करेगा, जिससे एलडीएफ की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है और अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को लाभ हो सकता है। एलडीएफ सरकार द्वारा विकास कार्यों का जोर-शोर से प्रचार और उनकी तुलना 2011-2016 के यूडीएफ शासनकाल की स्थिति से करना चुनावी संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है। यूडीएफ नेताओं द्वारा खुले तौर पर यह स्वीकार करना कि उन्हें जमात-ए-इस्लामी और वेलफेयर पार्टी से समर्थन मिला है, कुछ हिंदू और ईसाई मतदाताओं को नाराज कर सकता है।
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