केरल सरकार उच्च न्यायालय से टकराव नहीं चाहती, कामकाज के लिए अधिक स्वतंत्रता जरूरी : मंत्री

केरल सरकार उच्च न्यायालय से टकराव नहीं चाहती, कामकाज के लिए अधिक स्वतंत्रता जरूरी : मंत्री

केरल सरकार उच्च न्यायालय से टकराव नहीं चाहती, कामकाज के लिए अधिक स्वतंत्रता जरूरी : मंत्री
Modified Date: July 13, 2026 / 11:43 am IST
Published Date: July 13, 2026 11:43 am IST

कोझिकोड (केरल), 13 जुलाई (भाषा) केरल के देवस्वओम एवं स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन ने सोमवार को कहा कि राज्य सरकार न्यायपालिका से टकराव नहीं चाहती, लेकिन विशेषकर मंदिरों के प्रशासन से जुड़े मामलों में उसे कामकाज के लिए अधिक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

मुरलीधरन ने संवाददाताओं से बातचीत में मंदिरों के मामलों में न्यायपालिका के व्यापक हस्तक्षेप की आवश्यकता पर दिए गए अपने हालिया बयान के संबंध में पूछे गए सवालों के जवाब में यह बात कही।

उन्होंने कहा, ‘‘सरकार अदालत से टकराव नहीं चाहती। लेकिन साथ ही सरकार के अधिकारों की भी रक्षा होनी चाहिए।’’

शबरिमला स्वर्ण चोरी मामले का उल्लेख करते हुए मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार इस मामले में कोई और कदम उठाने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि केरल उच्च न्यायालय ने इसकी जांच विशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंप रखी है।

उन्होंने कहा, ‘‘सरकार फिलहाल शबरिमला स्वर्ण चोरी मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए कोई कदम नहीं उठा सकती। उच्च न्यायालय ने जांच एसआईटी को सौंपी है। अब तक आरोपपत्र दाखिल नहीं किया गया है। ऐसे में सरकार कुछ नहीं कर सकती।’’

मुरलीधरन ने कहा कि विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान यह मुद्दा प्रमुखता से उठा था और ‘सोना किसने चुराया’ जैसे सवाल चर्चा में थे।

उन्होंने कहा, ‘‘यदि इस मामले को साबित करना है तो या तो एसआईटी आरोपपत्र दाखिल करे या अदालत उसे निश्चित समयसीमा के भीतर ऐसा करने का निर्देश दे। अब तक इनमें से कुछ भी नहीं हुआ है।’’

मंत्री ने कहा कि आरोपपत्र दाखिल करने में अत्यधिक देरी का लाभ अंततः आरोपियों को मिल सकता है।

उन्होंने कहा, ‘‘जब तक आरोपपत्र दाखिल होगा, तब तक आरोपियों के बच निकलने की संभावना काफी बढ़ जाएगी, क्योंकि सोना चोरी करने में माहिर लोग सबूत मिटाने में भी माहिर होते हैं। इसी विवशता के कारण मैंने कल वह टिप्पणी की थी।’’

मुरलीधरन ने कहा कि मामला केवल स्वर्ण चोरी तक सीमित नहीं है, बल्कि त्रावणकोर देवस्वओम बोर्ड के प्रशासन से भी जुड़ा है।

उन्होंने कहा, ‘‘यदि सरकार के फैसलों में कोई त्रुटि होती है तो अदालत निश्चित रूप से हस्तक्षेप कर सकती है। अदालत ने सरकार के पक्ष और विपक्ष दोनों में फैसले दिए हैं और हमने उन्हें स्वीकार किया है।’’

मंत्री ने कहा कि जहां कोचीन और मालाबार देवस्वओम बोर्ड के आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार सरकार के पास है, वहीं त्रावणकोर देवस्वओम बोर्ड के मामले में प्रक्रिया अलग है।

उन्होंने कहा, ‘‘त्रावणकोर देवस्वओम बोर्ड के मामले में नामों का एक पैनल तैयार कर उच्च न्यायालय को भेजा जाता है और अंतिम निर्णय अदालत करती है। हमने केवल इसी व्यवस्था की खामियों की ओर ध्यान दिलाया है। यह न्यायपालिका की अवमानना या अनादर नहीं है।’’

उन्होंने कहा कि सरकार का मानना है कि उसे निर्णय लेने की कुछ स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। यदि उस स्वतंत्रता का इस्तेमाल करते समय सरकार से कोई गलती होती है तो अदालत हस्तक्षेप कर उसे सुधार सकती है, लेकिन निर्णय लेने का अधिकार सरकार के पास होना चाहिए।

विधानसभा में यह मुद्दा उठाने की संभावना के बारे में पूछे जाने पर मुरलीधरन ने कहा कि फिलहाल इस पर कोई विचार नहीं किया गया है।

शबरिमला के तंत्री पद से थझामोन परिवार को हटाने की भाजपा नेता के. एस. राधाकृष्णन की मांग पर उन्होंने कहा कि यह मामला सरकार के विचाराधीन नहीं है और मौजूदा कानूनी व्यवस्था के तहत इस पर फैसला त्रावणकोर देवस्वओम बोर्ड को करना है।

उन्होंने कहा, ‘‘वर्तमान कानून के अनुसार यह अधिकार तंत्री परिवार के पास है। हालांकि मौजूदा थझामोन तंत्री को लेकर संदेह की स्थिति उत्पन्न हुई है। उन्होंने स्वयं कहा है कि उनकी जगह उनका पुत्र यह जिम्मेदारी निभा सकता है। लेकिन देवस्वम बोर्ड ने कोई फैसला लेने के बजाय मामला उच्च न्यायालय के समक्ष छोड़ दिया।’’

जब संवाददाताओं ने कहा कि इस मामले में निर्णय लेने का अधिकार स्वयं बोर्ड के पास है, तो मंत्री ने सहमति जताते हुए कहा कि उच्च न्यायालय के पास मामला भेजना बोर्ड की गलती थी और उसने अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया।

कोविड-19 महामारी के दौरान केरल सोशल सिक्योरिटी मिशन की ‘ब्रेक द चेन’ परियोजना में कथित वित्तीय अनियमितताओं के संबंध में पूछे गए सवाल पर मुरलीधरन ने कहा कि पिछले 10 वर्षों के दौरान उपकरणों की खरीद और अन्य संबंधित मामलों की जांच के लिए तीन वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है।

उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव, अतिरिक्त सचिव, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के निदेशक, चिकित्सा शिक्षा निदेशक और स्वास्थ्य सेवा निदेशक को जांच का जिम्मा दिया गया है तथा उन्हें दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।

भाषा मनीषा रंजन

रंजन


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