अविनाश बाकोलिया
(फोटो सहित)
जयपुर, 12 जुलाई (भाषा) धार्मिक आस्था के चलते बंदरों को लड्डू, मिश्री, चूरमा और अन्य मीठे खाद्य पदार्थ खिलाने की परंपरा उनके लिए बड़ी बीमारी को न्योता दे रही है। जयपुर के प्रसिद्ध ‘गलता तीर्थ’ (गलता जी मंदिर) और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में बंदर गंभीर चर्म रोग की चपेट में हैं। कई बंदरों के शरीर से चमड़ी उतर रही है, घावों से खून रिस रहा है और वे चलने-फिरने, कूदने तथा पेड़ों पर चढ़ने तक में असमर्थ हो गए हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले कुछ समय से गलता तीर्थ और आसपास रहने वाले बंदरों में त्वचा संबंधी बीमारी तेजी से फैल रही है। संक्रमित बंदरों के शरीर से बाल झड़ रहे हैं, त्वचा फट रही है और हाथ-पैरों में गहरे घाव बन गए हैं। दर्द के कारण कई बंदर सामान्य रूप से चल भी नहीं पा रहे हैं और उनकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही है।
वरिष्ठ वन्यजीव चिकित्सक डॉ. अशोक तंवर ने ‘पीटीआई-भाषा’ बताया कि लाल मुंह वाले बंदर हाइपरकेरोटोसिस नामक बीमारी से ग्रसित हैं। यह बीमारी इंसानों में होने वाली गंभीर त्वचा शुष्कता जैसी स्थिति पैदा करती है।
उन्होंने बताया कि बंदरों में यह बीमारी श्रद्धालुओं द्वारा उन्हें ज्यादा मीठा खिलाने से फैल रही है और इस तरह के मामले गलता तीर्थ के आसपास रह रहे बंदरों में ही देखे जा रहे हैं।
तंवर ने बताया कि बंदरों की खानपान की आदत बदलने की वजह से यह बीमारी हो रही है। उन्होंने कहा कि चमड़ी में रुखापन आ जाता है और नमी की कमी से चमड़ी फटने लग जाती है।
उन्होंने कहा, “यह बीमारी इलाज योग्य है। वर्ष 2020 से इस तरह के कई बंदरों का सफलतापूर्वक उपचार किया गया है।”
तंवर ने कहा, ‘‘लोग बंदरों को चना, मखाना और लड्डू जैसी चीजें खिलाते हैं। लगातार ऐसा भोजन मिलने से उनमें एलर्जी और त्वचा संबंधी समस्याएं पैदा हो जाती है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘यदि बंदरों को उनके प्राकृतिक भोजन और प्राकृतिक वातावरण में रहने दिया जाए तो अधिकांश मामलों में वे स्वतः स्वस्थ हो सकते हैं।’’
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि बंदरों का प्राकृतिक आहार कंद-मूल, फल, गाजर, मूली, पत्तियां और अन्य वनस्पतियां हैं, लेकिन धार्मिक भावनाओं के कारण लोग उन्हें प्रसाद और मीठे खाद्य पदार्थ खिला देते हैं। यही आदत उनके स्वास्थ्य पर गंभीर और दीर्घकालिक दुष्प्रभाव डाल रही है।
विशेषज्ञों ने श्रद्धालुओं और पर्यटकों से अपील की है कि वे बंदरों को मीठा या पैकेट-बंद खाद्य पदार्थ बिल्कुल न खिलाएं।
वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि बंदरों का प्राकृतिक आहार इंसानों द्वारा दी जाने वाली प्रसंस्कृत और मीठी चीजों से बिल्कुल अलग है।
वन विभाग ने भी माना है कि गलता क्षेत्र के बंदरों में यह बीमारी फैल चुकी है। विभाग ने कई स्थानों पर चेतावनी बोर्ड लगाए हैं, जिनमें आगंतुकों से वन्यजीवों को भोजन न देने की अपील की गई है।
हालांकि अधिकारियों का कहना है कि बंदरों को पकड़कर उपचार करना आसान नहीं है, क्योंकि वे बेहद फुर्तीले होते हैं। ऐसे में नगर निगम की टीमें जाल की सहायता से संक्रमित बंदरों को पकड़कर जयपुर चिड़ियाघर पहुंचाएंगी, जहां वन्यजीव चिकित्सकों की निगरानी में उनका इलाज किया जाएगा।
क्षेत्रीय वन अधिकारी जितेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया कि वन विभाग की ओर से समय-समय पर लोगों के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। उन्हें समझाया जाता है कि लंगूरों-बंदरों को मीठा, मखाने, मिठाई, केले ना दें। उन्हें उनके प्राकृतिक भोजन पर ही निर्भर रहने दें। उन्होंने कहा, ‘‘साथ ही हमने गलता तीर्थ और आसपास के क्षेत्र में चेतावनी बोर्ड लगाए हुए हैं, जिसमें लोगों को खाद्य सामग्री नहीं डालने को कहा गया है।’’
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते लोगों की आदतों में बदलाव नहीं आया और बंदरों को प्राकृतिक आहार उपलब्ध नहीं कराया गया, तो यह बीमारी और अधिक फैल सकती है तथा बड़ी संख्या में बंदरों की जान पर खतरा मंडरा सकता है।
भाषा बाकोलिया रंजन सुरेश
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