कानून की संवैधानिक वैधता पर चुनौती को लेकर निर्णय बड़ी पीठ को करना चाहिए: न्यायमूर्ति शर्मा

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कानून की संवैधानिक वैधता पर चुनौती को लेकर निर्णय बड़ी पीठ को करना चाहिए: न्यायमूर्ति शर्मा

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  • Publish Date - September 23, 2026 / 09:08 PM IST,
    Updated On - September 23, 2026 / 09:08 PM IST

नयी दिल्ली, 23 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा ने बुधवार को कहा कि कानून चाहे पुराना हो या नया, अगर किसी कानून की वैधता पर इस आधार पर सवाल उठाया जाता है कि वह संवैधानिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता, तो इस मामले का फैसला एक बड़ी पीठ को करना चाहिए।

न्यायमूर्ति शर्मा उस पीठ का हिस्सा थे जिसमें न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता भी शामिल थे। इस पीठ ने 2023 के उस कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अलग-अलग राय दी, जिसके तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और निर्वाचन आयुक्तों (ईसी) को चुनने वाली समिति से प्रधान न्यायाधीश को बाहर रखा गया है। इन याचिकाओं को फैसले के लिए एक बड़ी संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं, इस पर पीठ की राय बंटी हुई थी।

उन्होंने अपनी अलग राय में कहा कि केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने के लिए जो तर्क दिए हैं, वे ठोस हैं।

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा, ‘‘इस अदालत का आज तक ऐसा कोई आधिकारिक फैसला नहीं आया है जिसमें इस अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर कोई राय दी गई हो। जब यह अदालत इस अधिनियम की धारा-सात और इसके दूसरे प्रावधानों की वैधता के मुद्दे पर विचार कर रही है, तो उसे संविधान के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए एक न्यायिक फैसला देना होगा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इन रिट याचिकाओं पर फैसला अपनी तरह का पहला फैसला होगा और इसलिए यह और भी जरूरी है कि इस मामले को (बड़ी पीठ को) ‘रेफर’ किया जाए।’’

उन्होंने कहा कि ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ के प्रावधानों को चुनौती देना संवैधानिक महत्व का मामला है और इसमें संविधान की व्याख्या से जुड़े कानून के अहम सवाल उठते हैं, इसलिए इन मामलों की सुनवाई कम से कम पांच-सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा की जानी चाहिए।

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि कॉलेजियम प्रणाली पर मेहता की दलील कोई आलोचना नहीं थी, बल्कि उन्होंने सिर्फ राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) मामले का जिक्र किया था, जिसमें इस अदालत ने कहा था कि उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के चयन के लिए कॉलेजियम में कानून मंत्री की मौजूदगी भी ‘शक्तियों के पृथक्करण’ के सिद्धांत का उल्लंघन है।

भाषा वैभव सुरेश

सुरेश