पुरी, 27 जुलाई (भाषा) भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र तथा देवी सुभद्रा की वार्षिक रथ यात्रा का समापन सोमवार को ‘नीलाद्रि बीजे’ अनुष्ठान के साथ हो गया। वे 12 दिन बाहर बिताने के बाद 12वीं सदी के मंदिर में वापस लौट आए।
‘नीलाद्रि बीजे’ अनुष्ठान वार्षिक रथ यात्रा का अंतिम चरण माना जाता है। रथ यात्रा 16 जुलाई को शुरू हुई थी, जब भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ रथों पर सवार होकर मुख्य मंदिर से 2.6 किलोमीटर दूर स्थित अपने जन्मस्थान श्रीगुंडिचा मंदिर के लिए रवाना हुए थे।
चौबीस जुलाई को बहुडा यात्रा या वापसी रथ यात्रा के बाद से ही अपने-अपने रथों पर विराजमान विग्रहों को एक-एक करके एक औपचारिक शोभायात्रा के साथ मंदिर के गर्भगृह में ले जाया गया और मंदिर के भीतर स्थापित किया गया।
सबसे पहले भगवान जगन्नाथ के चक्र स्वरूप शस्त्र श्रीसुदर्शन को मंदिर में प्रवेश कराया गया। इसके बाद भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को ले जाया गया।
अंत में ‘हरिबोल’ और ‘जय जगन्नाथ’ के जयघोष के बीच भगवान जगन्नाथ के विग्रह को मंदिर में प्रवेश कराया गया।
इस वर्ष रथ यात्रा पूरी तरह दुर्घटनारहित नहीं रही। गर्मी और उमस भरे मौसम के कारण दम घुटने से कम से कम तीन लोगों की मौत हो गई। 16 जुलाई को रथ यात्रा के दिन दो लोगों की जान गई।
गर्मी, उमस और भारी भीड़ के कारण कई श्रद्धालुओं की तबीयत भी बिगड़ गई। समुद्र तटीय इस तीर्थ नगरी में 10 दिनों के दौरान देश-विदेश से 50 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचे।
मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कहा, “हर श्रद्धालु की सुरक्षा, सुविधा और सुगम दर्शन हमारी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। महाप्रभु की कृपा और सभी के सहयोग से इस वर्ष श्रीक्षेत्र में श्रद्धालु शांतिपूर्ण वातावरण और उत्कृष्ट व्यवस्थाओं के बीच महाप्रभु के दिव्य दर्शन कर रहे हैं।”
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शुभम प्रशांत
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