संवैधानिक लोकतंत्र में बहुसंख्यकवाद संविधान से ऊपर नहीं हो सकता : न्यायालय

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संवैधानिक लोकतंत्र में बहुसंख्यकवाद संविधान से ऊपर नहीं हो सकता : न्यायालय

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  • Publish Date - May 13, 2026 / 10:24 PM IST,
    Updated On - May 13, 2026 / 10:24 PM IST

नयी दिल्ली, 13 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र में बहुसंख्यकवाद संविधान से ऊपर नहीं हो सकता।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कोई प्रथा ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य’ का उल्लंघन करती है, तो अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं।

केंद्र सरकार ने कहा कि धार्मिक मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा बहुत सीमित है और ऐसे मुद्दों को विधायिका पर छोड़ दिया जाना चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-सदस्यीय की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी केरल के शबरिमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और दाऊदी बोहरा समुदाय सहित कई धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की।

न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम. एम. सुन्दरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची भी संविधान पीठ का हिस्सा हैं।

केंद्र सरकार की ओर से पेश तुषार मेहता ने सुनवाई के पंद्रहवें दिन अपनी जवाबी दलीलें पेश करते हुए कहा कि विधायिका समाज में चल रही बुराइयों के प्रति हमेशा सजग रहती है।

उन्होंने कहा, ‘‘धर्म के भीतर से ही सुधार आते हैं। जैसे ‘सती’ प्रथा एक सामाजिक बुराई थी और उसमें सुधार किया गया। प्रश्न यह है कि क्या न्यायालय धर्म का सुधारक बन सकता है?’’

मेहता ने कहा, ‘‘मेरा विनम्र और स्पष्ट उत्तर ‘नहीं’ होगा। इसका कारण यह है कि संविधान की व्यवस्था सुधार का दायित्व विधायिका को सौंपती है…।’’

उन्होंने कहा कि किसी कानून को पारित करने से पहले विस्तृत प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसमें प्रवर समिति विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को आमंत्रित करती है और परामर्श की प्रक्रिया चलती है।

मेहता ने कहा, ‘‘इस देश का प्रत्येक नागरिक संसद में अपने प्रतिनिधि के माध्यम से मौजूद है और जब कोई कानून पारित होता है, तो उसकी स्वीकार्यता न्यायिक फैसले की तुलना में कहीं अधिक होती है। इसलिए संसद ने सुधार का कार्य सरकार पर छोड़ रखा है।’’

उनके इस कथन से असहमति जताते हुए न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा कि धार्मिक मुद्दों को केवल विधायिका पर छोड़ देने का तर्क स्वीकार्य नहीं है।

न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा, ‘‘क्या इसका अर्थ यह है कि केवल बहुसंख्यकवाद के कारण… हमें ऐसा नहीं करना चाहिए?’’

न्यायमूर्ति अमानुल्लाह की टिप्पणी पर आश्चर्य जताते हुए मेहता ने “बहुसंख्यकवाद” शब्द के प्रयोग पर सवाल उठाया।

मेहता ने कहा, “मुझे खेद है। यह लोकतंत्र है। लोकतंत्र का अर्थ बहुमत होता है।”

इस पर न्यायमूर्ति बागची ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, ‘‘न्यायालय की चिंता बहुसंख्यकवाद को लेकर नहीं है। न्यायालय की वास्तविक चिंता यह है कि कहीं बहुसंख्यकवाद संविधानवाद पर हावी न हो जाए, और यही ‘लक्ष्मण रेखा’ है।’’

न्यायमूर्ति बागची ने मौखिक रूप से कहा, ‘‘हम ऐसे लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध हैं जो निश्चित रूप से संख्या की कसौटी पर आधारित है, लेकिन हम एक संवैधानिक लोकतंत्र भी हैं। इसलिए यदि बहुमत यह महसूस करे कि कोई विशेष कार्य किया जाना चाहिए, तब भी अदालतों की भूमिका उस निर्णय को संवैधानिक सिद्धांतों की कसौटी पर परखने की रहती है।’’

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर रिट याचिका में कोई न्यायालय किसी धार्मिक प्रथा या धार्मिक परंपरा को निरस्त नहीं कर सकता, क्योंकि यह “त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण” होगा।

मेहता ने दलील दी कि न्यायालय द्वारा की जाने वाली कोई भी न्यायिक समीक्षा केवल संविधान के अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 21 की व्याख्या, अथवा भेदभाव के प्रश्न और संवैधानिक कसौटी पूरी होने तक सीमित नहीं हो सकती।

सॉलिसिटर जनरल ने न्यायालय से कहा कि न्यायिक समीक्षा उस व्यक्ति के दृष्टिकोण से की जानी चाहिए जो उस धर्म का पालन करता है और जिसकी आस्था व्यवस्था संविधान द्वारा संरक्षित है।

मामले में विभिन्न वरिष्ठ अधिवक्ताओं- सी. एस. वैद्यनाथन, अभिषेक सिंघवी, इंदिरा जयसिंह, नीरज किशन कौल और गोपाल शंकरनारायणन- ने भी अपनी दलीलें पेश कीं।

मामले की सुनवाई अब बृहस्पतिवार को फिर होगी।

न्यायालय ने इससे पहले दिन में टिप्पणी करते हुए कहा कि हिंदू धर्म एक जीवन पद्धति है। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी हिंदू के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि वह मंदिर जाए या कोई धार्मिक अनुष्ठान करे, ताकि वह हिंदू बना रहे।

न्यायालय ने कहा कि केवल घर के भीतर दीपक जलाना भी किसी व्यक्ति की आस्था को दर्शाने के लिए पर्याप्त हो सकता है।

हस्तक्षेपकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए अधिवक्ता डॉ. जी मोहन गोपाल ने कहा कि धार्मिक समुदायों के भीतर से सामाजिक न्याय की मांग उठ रही है।

उन्होंने कहा, ‘‘हिंदू धर्म को एक धार्मिक श्रेणी के रूप में परिभाषित किया गया था। उसके बाद 1966 में यह माना गया कि हिंदू वह है जो धर्म और दर्शन के सभी मामलों में वेदों को सर्वोच्च मानता है। उन्होंने मुझसे कभी नहीं पूछा। हममें से किसी ने भी ऐसा कभी नहीं कहा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मेरा वेदों के प्रति अत्यंत आदरभाव है। लेकिन क्या यह सच है कि आज हिंदू कहलाने वाला प्रत्येक व्यक्ति आध्यात्मिक और दार्शनिक मामलों में वेदों को सर्वोच्च मानता है?’’

उनकी दलील का जवाब देते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘इसीलिए हिंदुत्व को जीवनशैली कहा जाता है। हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना या कोई अनुष्ठान करना अनिवार्य नहीं है।’’

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि हो सकता है कि किसी को कर्मकांडी होने की जरूरत नहीं है और आस्था रखने वाले लोगों के रास्ते में कोई बाधा नहीं बन सकता।

प्रधान न्यायाधीश ने यह भी टिप्पणी की, ‘यदि कोई व्यक्ति अपने घर में एक दीपक भी जलाता है, तो यह उसके धर्म को साबित करने के लिए पर्याप्त है।’’

न्यायालय ने इससे पहले टिप्पणी की थी कि यदि व्यक्ति किसी संवैधानिक अदालत के समक्ष हर धार्मिक प्रथा या धर्म से संबंधित मामलों पर सवाल उठाना शुरू कर दें, तो सैकड़ों याचिकाएं दायर की जाएंगी और इसके कारण हर धर्म ‘टूट’ जाएगा।

सितंबर 2018 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने बहुमत से फैसला सुनाते हुए शबरिमला अयप्पा मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु वाली महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था, और फैसला सुनाया था कि सदियों पुरानी हिंदू धार्मिक प्रथा अवैध और असंवैधानिक है।

भाषा सुरेश माधव

माधव