कोलकाता, 18 सितंबर (भाषा) पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस को अपनी पार्टी का समर्थन देने की शुक्रवार को घोषणा की। उन्होंने यह घोषणा अपनी पार्टी की उम्मीदवार के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाक़ात के बाद चुनाव से हटने के कुछ घंटों बाद की।
कांग्रेस को तृणमूल की ‘‘करीबी पार्टी’’ बताते हुए बनर्जी ने कहा कि इस कदम का मकसद विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ को मज़बूत करना है।
ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट स्थित आवास पर संवाददाता सम्मेलन में कहा कि उनके गुट ने ‘‘पहले ही नंदीग्राम में कांग्रेस का समर्थन करने का फैसला किया था, और यह भविष्य की शुरुआत है।’’
उनकी यह टिप्पणी तृणमूल कांग्रेस के लिए एक बड़ा राजनीतिक ‘यू-टर्न’ है। राज्य में 15 वर्ष तक सत्तारूढ़ रहने के दौरान तृणमूल का यही रुख रहा है कि वह बंगाल में अकेले ही भाजपा का मुक़ाबला कर सकती है और उसने राज्य में चुनावी समझौते के लिए कांग्रेस के प्रस्तावों को बार-बार ठुकराया है।
ममता बनर्जी ने कहा, ‘‘विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ को मज़बूत करने का संदेश बंगाल से शुरू होने दें।’’
यह घटनाक्रम संचिता प्रधान डे के मैदान से हटने के बाद हुआ, जिन्हें ममता गुट ने नंदीग्राम से मैदान में उतारा था। प्रधान डे ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री अधिकारी से मुलाक़ात की और बाद में अपना नामांकन वापस ले लिया, जिससे उपचुनाव वाले क्षेत्र में ममता बनर्जी खेमे का कोई उम्मीदवार नहीं बचा।
कांग्रेस ने नंदीग्राम से मिलन प्रधान को मैदान में उतारा है और ममता की घोषणा का मतलब है कि उनका गुट अब कोई दूसरा उम्मीदवार नहीं खड़ा करेगा और कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देगा।
इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए वरिष्ठ कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि ममता बनर्जी घोषणा करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन कांग्रेस ने उनसे समर्थन नहीं मांगा था।
चौधरी ने कहा, ‘‘वह एक राजनीतिक नेता हैं। वह जो चाहें कह सकती हैं। लेकिन सच यह है कि उन्होंने एक उम्मीदवार खड़ा किया था और अब जब उम्मीदवार हट गयी हैं, तो वह हमें समर्थन दे रही हैं। हमने उनसे समर्थन नहीं मांगा है।’’
ममता ने रेजीनगर सीट के बारे में फैसला बाद में लेने की बात कहकर उस पर स्थिति साफ नहीं की है।
नंदीग्राम की घोषणा बनर्जी के लिए ख़ास राजनीतिक महत्व रखती है। 2007 में इस क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन उनके राजनीतिक सफर की अहम लड़ाइयों में से एक बन गया था और इसने वाम मोर्चा के ख़िलाफ तृणमूल कांग्रेस के अभियान को आगे बढ़ाने में मदद की। इसके बाद 2011 में पार्टी पश्चिम बंगाल में सत्ता में आयी।
तृणमूल ने 2011 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के साथ गठबंधन में लड़ा था और राज्य में वाम मोर्चा के 34 साल के शासन को खत्म किया था।
ममता ने 15 साल बाद, नंदीग्राम में फिर से कांग्रेस को समर्थन दिया है। लेकिन इस बार विपक्ष की स्थिति बदली हुई है।
इस हफ़्ते की शुरुआत में ही कांग्रेस-तृणमूल रिश्तों में अप्रत्याशित मोड़ आया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रदीप भट्टाचार्य ने दावा किया कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व से एक प्रस्ताव के साथ संपर्क किया था, जिसके तहत कांग्रेस नंदीग्राम से चुनाव लड़ती और तृणमूल रेजीनगर से।
इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी पश्चिम बंगाल इकाई से सलाह-मशविरा किया, जिसने इस चरण में चुनावी समझौते का विरोध किया। तृणमूल ने इस दावे को खारिज कर दिया कि उसने ऐसा कोई प्रस्ताव दिया था।
राष्ट्रीय स्तर पर दोनों पार्टी ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में तृणमूल और कांग्रेस ज़्यादातर चुनावी प्रतिद्वंद्वी रही हैं।
भाषा अविनाश दिलीप
दिलीप