नयी दिल्ली, 20 अगस्त (भाषा) भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) ने 11वीं और 12वीं कक्षा की राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों को तैयार करने के लिए राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा पुनर्गठित टीम की आलोचना करते हुए कहा है कि इसमें ऐसे सदस्य शामिल हैं जिनका ‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े तंत्र’’ से प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध है।
एनएसयूआई ने टीम की संरचना को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि आरएसएस और उसकी छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े लोगों को इसमें शामिल किए जाने से स्कूली पाठ्यपुस्तकों को तैयार करने में अकादमिक निष्पक्षता और वैचारिक विविधता को लेकर सवाल उठते हैं।
एनसीईआरटी द्वारा पुनर्गठित इस टीम को इस साल नवंबर तक 11वीं कक्षा और अगले साल जुलाई तक 12वीं कक्षा की पाठ्यपुस्तक तैयार करने का जिम्मा सौंपा गया है।
पाठ्यपुस्तक तैयार करने वाली टीम का नेतृत्व जाने-माने शिक्षाविद एवं राजनीतिक विश्लेषक संदीप शास्त्री करेंगे जो कर्नाटक स्थित डीम्ड विश्वविद्यालय निट्टे के उपाध्यक्ष हैं।
टीम में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), दिल्ली विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) जैसे संस्थानों के शिक्षाविद् और शिक्षा विशेषज्ञ शामिल हैं।
टीम में कम से कम चार ऐसे शिक्षाविद एवं विद्वान (यदुनाथ देशपांडे, प्रशांत दिवेकर, वंदना मिश्रा और रवि रमेशचंद्र शुक्ला) शामिल हैं, जो एबीवीपी और आरएसएस से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहे हैं।
शिक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ सलाहकार यदुनाथ देशपांडे का एबीवीपी के साथ संगठनात्मक जुड़ाव रहा है, जबकि प्रशांत दिवेकर पुणे स्थित ‘ज्ञान प्रबोधिनी’ से जुड़े रहे हैं, जो आरएसएस से संबद्ध संस्था है। जेएनयू के राजनीतिक अध्ययन केंद्र की प्रोफेसर वंदना मिश्रा एबीवीपी की पूर्व राष्ट्रीय सचिव हैं, जबकि जेएनयू के एसोसिएट प्रोफेसर रवि रमेशचंद्र शुक्ला ‘इंडियन जर्नल ऑफ डेमोक्रेटिक गवर्नेंस’ के संपादकीय मंडल में रह चुके हैं। इस पत्रिका का प्रकाशन ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ डेमोक्रेटिक लीडरशिप-रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी’ करता है, जो आरएसएस से जुड़ा शिक्षण संस्थान है।
कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई ने आरोप लगाया कि ऐसे सदस्यों की मौजूदगी संविधान, लोकतंत्र, मौलिक अधिकारों, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद और सामाजिक न्याय जैसे विषयों से संबंधित पाठ्यपुस्तकों की वैचारिक दिशा को प्रभावित कर सकती है।
एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने कहा, ‘‘एनसीईआरटी एक राष्ट्रीय अकादमिक संस्था है, किसी राजनीतिक संगठन का विस्तार नहीं।’’
उन्होंने मौजूदा टीम को भंग कर स्वतंत्र शिक्षा विशेषज्ञों, राजनीति विज्ञान के विद्वानों, संवैधानिक विशेषज्ञों और अनुभवी शिक्षकों को शामिल करते हुए इसका पुनर्गठन करने की मांग की।
एनएसयूआई ने यह भी मांग की कि सभी सदस्यों की योग्यता, विशेषज्ञता और चयन के मानदंड सार्वजनिक किए जाएं तथा पाठ्यपुस्तकों के मसौदों की स्वतंत्र अकादमिक समीक्षा कराई जाए एवं सार्वजनिक विचार-विमर्श कराया जाए।
जाखड़ ने कहा, ‘‘शिक्षा का उद्देश्य युवा भारतीयों को सवाल पूछने, तर्क करने, आलोचनात्मक ढंग से सोचने और संविधान को समझने में सक्षम बनाना होना चाहिए, न कि उन्हें किसी विचारधारा का अनुयायी बनाना।’’
एनएसयूआई ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में आरोप लगाया कि समिति में आरएसएस से जुड़े सदस्यों की मौजूदगी ‘‘बेहद गंभीर सवाल’’ खड़े करती है। उसने सरकार पर शिक्षा व्यवस्था को ‘‘वैचारिक प्रयोगशाला’’ में बदलने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया।
भाषा
सिम्मी मनीषा
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