तृणमूल में संगठनात्मक बदलाव: ममता कार्यकर्ताओं से संपर्क बढ़ाएंगी, आई-पैक की भूमिका कम की जाएगी

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तृणमूल में संगठनात्मक बदलाव: ममता कार्यकर्ताओं से संपर्क बढ़ाएंगी, आई-पैक की भूमिका कम की जाएगी

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  • Publish Date - June 23, 2026 / 09:16 PM IST,
    Updated On - June 23, 2026 / 09:16 PM IST

नयी दिल्ली, 23 जून (भाषा) पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद सांसदों और विधायकों की भारी बगावत का सामना कर रही तृणमूल कांग्रेस ने संगठनात्मक बदलाव की कवायद शुरू कर दी है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी का जोर इस बात पर है कि बड़े नेता कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संपर्क बढ़ाएं और राजनीतिक परामर्श फर्म आई-पैक पर निर्भरता कम करें।

सूत्रों ने बताया कि बदलावों के तहत तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी और महासचिव अभिषेक बनर्जी कार्यकर्ताओं के साथ संपर्क बढ़ाएंगे और पार्टी कार्यालयों में नियमित बैठकें आयोजित करेंगे।

सूत्रों के अनुसार, कोलकाता में तृणमूल का कालीघाट स्थित कार्यालय (जो ममता का आवास भी है) रविवार को छोड़कर हर दिन आम जनता के लिए खुला रहेगा और ममता-अभिषेक कामकाजी घंटों में लोगों से मिलने के लिए उपलब्ध रहेंगे।

सूत्रों ने बताया कि पार्टी कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस भवन में भी इसी तरह की सुविधा उपलब्ध कराने की योजना बना रही है।

उन्होंने कहा कि इस कदम का मकसद पार्टी संगठन को उसके कार्यकर्ता-आधारित ढांचे में वापस लाना है, क्योंकि तृणमूल ने तय किया है कि वह सिर्फ बाहरी एजेंसियों पर निर्भर नहीं रह सकती।

एक सूत्र ने कहा, “पार्टी को एक संगठन के जरिये चलाया जाना चाहिए। आप कुछ काम बाहरी एजेंसी को सौंप सकते हैं, लेकिन संगठन को उसके कार्यकर्ता-आधारित ढांचे में वापस लाना ही पहला बदलाव है।”

सूत्रों के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस आई-पैक की भूमिका में भी कटौती करने पर विचार कर रही है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद न सिर्फ ममता के नेतृत्व वाले खेमे, बल्कि बागी गुट के कई नेताओं ने भी इस राजनीतिक परामर्श फर्म के खिलाफ आवाज उठाई है।

एक सूत्र ने कहा, ‘‘वर्ष 2019 से पहले सिर्फ 20 फीसदी कामकाज बाहरी एजेंसियों को सौंपा जाता था, लेकिन बाद में यह आंकड़ा बढ़ता ही गया।’’ उसने कहा कि पार्टी अब एक बार फिर अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने पर ध्यान दे रही है।

तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने ढांचागत बदलावों की ओर इशारा किया, जिसमें पहली बार दो संयुक्त सचिव की नियुक्ति भी शामिल है। उन्होंने कहा कि इससे अभिषेक बनर्जी का “बोझ” कम करने में मदद मिलेगी।

नेता ने कहा, “वे (नवनियुक्त सचिव) रबर की मुहर नहीं हैं। इन नियुक्तियों का मकसद तालमेल को बेहतर बनाना और संगठन की भूमिका को मजबूत करना है।”

उन्होंने बताया कि पार्टी नियुक्तियों और अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर भी सावधानी बरत रही है और नेतृत्व ने गलती करने वाले नेताओं एवं कार्यकर्ताओं के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करने के बजाय “इंतजार करो और देखो” की नीति अपनाई है।

नेता ने कहा, “जब तक कोई बहुत गंभीर हरकत नहीं करता, हम कारण बताओ नोटिस के चक्कर में नहीं पड़ेंगे। अनुशासनात्मक समिति भी अभी ‘इंतजार करो और देखो’ की नीति पर अमल कर रही है।”

उन्होंने बताया कि पार्टी का ध्यान आत्म-मंथन और आंतरिक चुनौतियों के बीच अपने कार्यकर्ताओं की सुरक्षा पर है।

नेता ने नेतृत्व के सवाल को खारिज करते हुए कहा कि पार्टी के संविधान और निर्वाचन आयोग को सौंपे गए दस्तावेजों में इस बारे में स्पष्ट रूप से बताया गया है।

उन्होंने कहा, “तृणमूल का नेता कौन है, यह सवाल पूछने लायक नहीं है। तृणमूल कांग्रेस के संविधान में यह साफ तौर पर लिखा है कि नेता कौन है, अध्यक्ष कौन है और प्रभारी कौन है।”

पार्टी में बगावत के मुद्दे पर नेता ने कहा कि अलग हुए सांसद “गद्दार” हैं और पार्टी को न सिर्फ आत्ममंथन करना होगा, बल्कि संगठन को कमजोर करने की कोशिशों से भी अपनी रक्षा करनी होगी।

उन्होंने कहा, “एक तरफ तृणमूल कांग्रेस है और दूसरी तरफ ‘गद्दार’ हैं।”

नेता ने इस संकट के लिए दबाव और प्रलोभन, दोनों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि कुछ नेताओं को सचमुच दबाव का सामना करना पड़ा।

जब नेता से पूछा गया कि तृणमूल में बगावत की तुलना शिवसेना में विभाजन से की जा रही है, तो उन्होंने कहा कि दोनों मामले एक जैसे नहीं हैं।

नेता ने कहा, “शिवसेना के मामले में, आपका सामना बालासाहेब (ठाकरे) से नहीं हो रहा था। जरा सोचिए, अगर वह जिंदा होते, तो क्या कोई शिवसेना को ले जा सकता था…।”

नेता ने आरोप लगाया कि जो लोग अब तृणमूल कांग्रेस के साथ नहीं हैं, उन्होंने कुछ अंदरूनी दबाव बनाया था और अपनी बात को सुझाव के तौर पर पेश किया था, इससे पहले कि नेतृत्व को चुनौती की असलियत का पता चलता।

तृणमूल कांग्रेस के 20 लोकसभा सदस्यों ने त्रिपुरा स्थित नेशनलिस्ट सिटिजेंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल होने का दावा किया है और कहा कि वे असली तृणमूल कांग्रेस होने का दावा पेश करेंगे। हालांकि, ममता खेमे ने इन सदस्यों को दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य ठहराए जाने की मांग की है।

वहीं, ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल के बागी विधायकों ने सोमवार को कोलकाता में एक विशेष सत्र आयोजित किया, जिसमें एक समानांतर संगठनात्मक ढांचा बनाने की घोषणा की गई और वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को पार्टी का अध्यक्ष चुना गया। ऋतब्रत को पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर मान्यता मिल चुकी है।

हालांकि, ममता खेमे ने इस कवायद को खारिज कर दिया। वरिष्ठ नेता कुणाल घोष ने कहा कि बागी नेताओं के पास ऐसा सत्र बुलाने या पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव करने का कोई अधिकार नहीं है।

भाषा पारुल सुरेश

सुरेश