दुर्ग (छत्तीसगढ़), पांच जुलाई (भाषा) प्रख्यात पंडवानी गायिका तीजन बाई का रविवार को छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में स्थित उनके पैतृक गांव गनियारी में राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। महाभारत की गाथा को वैश्विक मंचों तक पहुंचाने वाली इस आवाज को अंतिम विदाई देने के लिए वहां सैकड़ों लोग एकत्र हुए।
वह 70 वर्ष की थी
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान पर एक अमिट छाप छोड़ने वाली पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन का लंबी बिमारी के बाद रायपुर में निधन हो गया।
तिरंगे में लिपटे तीजन बाई के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए गांव के श्मशान घाट लाया गया, जहां उनके अंतिम दर्शन के लिए लोक कलाकारों, प्रशंसकों और जनप्रतिनिधियों की भीड़ जमा थी।
पुलिस कर्मियों द्वारा औपचारिक सम्मान दिए जाने के बाद तीजन बाई के पुत्र दिलहरण पारधी ने चिता को मुखाग्नि दी।
तीजन बाई को पुष्पांजलि अर्पित करने वालों में छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, भारतीय जनता पार्टी के सांसद विजय बघेल और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल शामिल थे।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ की पंडवानी परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। बघेल ने अपने स्कूली दिनों में उनकी प्रस्तुतियां देखने के समय को भी याद किया।
तीजन का रविवार तड़के रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया, जहां 27 मई से उनका उपचार किया जा रहा था।
तीजन बाई का जन्म 1956 में दुर्ग जिले के गनियारी गांव में हुआ था। उन्होंने गरीबी और सामाजिक बंधनों के बावजूद देश की सबसे प्रसिद्ध पंडवानी कलाकार के रूप में अपनी पहचान बनाई।
अपनी दमदार आवाज, नाटकीय अंदाज में कथा कहने और जीवंत प्रस्तुतियों के लिए जानी जाने वाली तीजन बाई ने पारंपरिक लोककथा प्रस्तुति शैली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित कला में बदल दिया।
भारतीय लोक कलाओं में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोक कला को एक विशिष्ट वैश्विक पहचान दिलाई।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि भारतीय लोककला और संस्कृति के क्षेत्र में तीजन बाई का अतुलनीय योगदान सदैव स्मरण रहेगा जबकि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि पंडवानी को संरक्षित करने और उसे लोकप्रिय बनाने में उनके योगदान को पीढ़ियों तक याद रखा जाएगा।
भाषा प्रचेता नरेश
नरेश