पॉलिसीधारक का दावा कभी नहीं लिया विवादित ऋण, सीआईसी ने एलआईसी से उपलब्ध जानकारी साझा करने को कहा

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पॉलिसीधारक का दावा कभी नहीं लिया विवादित ऋण, सीआईसी ने एलआईसी से उपलब्ध जानकारी साझा करने को कहा

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  • Publish Date - April 21, 2026 / 07:14 PM IST,
    Updated On - April 21, 2026 / 07:14 PM IST

(मोहित सैनी)

नयी दिल्ली, 21 अप्रैल (भाषा) केंद्रीय सूचना आयोग ने जीवन बीमा निगम (एलआईसी) को निर्देश दिया कि वह आरटीआई आवेदक को उपलब्ध जानकारी सहित संशोधित उत्तर प्रस्तुत करे।

आवेदक ने अपनी 50 लाख रुपये की बीमा पॉलिसी के तहत कथित रूप से लिए गए कुछ ऋणों के बारे में जानकारी मांगी थी।

उसने दावा किया था कि उसने इन ऋणों के लिए न तो कभी अनुरोध किया और न ही कभी आवेदन किया।

आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम की धारा 8(1)(एच) के तहत सूचना देने से इनकार करने का औचित्य सिद्ध करने में विफल रही, जिसके बाद यह आदेश जारी किया गया।

एलआईसी ने दावा किया था कि सूचना का खुलासा जांच में बाधा डाल सकता है क्योंकि मामला उपभोक्ता अदालत के समक्ष लंबित है और प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है।

आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(एच) ऐसी सूचनाओं को छूट देती है जो अपराधियों की जांच, गिरफ्तारी या अभियोजन की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं।

टिप्पणी के लिए भेजे गए प्रश्नों पर एलआईसी से कोई प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई। यह मामला एक आरटीआई आवेदन से संबंधित है, जिसमें आवेदक की पॉलिसी के तहत कथित रूप से वितरित किए गए दो ऋणों से संबंधित दस्तावेज मांगे गए।

आवेदक को पॉलिसी के पूरा होने पर लगभग 81.7 लाख रुपये मिलने थे। आवेदक ने बताया कि उन्होंने पहले भी पॉलिसी के तहत बैंकों से ऋण लिए थे और उन्हें चुका दिया था।

एलआईसी ने हालांकि परिपक्वता अवधि के समय उन्हें दो अतिरिक्त ऋणों के बारे में सूचित किया, जो दिसंबर 2007 में कथित रूप से वितरित किए गए 10.45 लाख रुपये और 15.89 लाख रुपये का था, जिनके बारे में आवेदक ने कहा कि उसने कभी भी ये ऋण नहीं लिए।

आवेदक ने दावा किया कि उन्होंने ‘कभी भी उपरोक्त ऋणों के लिए अनुरोध या आवेदन नहीं किया था’।

उन्होंने आरोप लगाया कि ये लेनदेन उनकी सहमति के बिना किए गए थे, जिसमें एलआईसी एजेंट और अन्य लोगों की संलिप्तता थी।

आवेदक ने आरोप लगाया कि ऋण राशि उनकी जानकारी के बिना उनके और एलआईसी के एक एजेंट के नाम पर खोले गए संयुक्त बैंक खाते में जमा की गई और बाद में उस राशि को एजेंट से जुड़े एक अन्य खाते में अंतरित कर निकाल लिया गया। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने ऐसा खाता खोलने के लिए कभी भी हस्ताक्षर नहीं किए थे।

पॉलिसीधारक के अनुसार, इन कथित ऋणों और अर्जित ब्याज को समायोजित करने के बाद देय राशि घटकर 36.67 लाख रुपये रह गई थी। आवेदक के वकील ने सुनवाई के दौरान दलील दी कि मांगी गई जानकारी केवल पॉलिसीधारक से संबंधित थी और उसे प्रकट किया जाना चाहिए था।

एलआईसी ने यह दलील दी कि मामला लखनऊ स्थित राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एससीडीआरसी) के समक्ष लंबित होने और इस मामले में दो प्राथमिकियां दर्ज होने के कारण सूचना देने से इनकार किया गया था।

एलआईसी ने यह भी कहा कि जानकारी का खुलासा जांच में बाधा डाल सकता है।

आयोग ने आठ अप्रैल को निर्देश दिया, “उपरोक्त तथ्यों के मद्देनजर प्रतिवादी (एलआईसी) को आवेदक को सभी बिंदुओं पर संशोधित जवाब देने का निर्देश दिया जाता है।”

भाषा जितेंद्र रंजन

रंजन