(मोहित सैनी)
नयी दिल्ली, तीन अप्रैल (भाषा) एक कश्मीरी परिवार को सात और आठ दिसंबर, 1992 की दरमियानी रात को ‘‘आतंकवाद से संबंधित घटना’’ में नष्ट हुई उनकी संपत्ति के लिए तीन दशकों से भी ज्यादा समय से मुआवजे का इंतजार है। अब यह मामला केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) तक पहुंच गया है और इस परिवार की दूसरी पीढ़ी मुआवजे को लेकर जवाब मांग रही है।
अपीलकर्ता प्राण नाथ के अनुसार संपत्तियों में जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के वेरीनाग में लगभग 10 मरला भूमि पर निर्मित तीन मंजिला एक आवासीय मकान, एक बहुमंजिला गौशाला और अन्न भंडार शामिल थे। घटना में ये संपत्तियां नष्ट हो गई थीं।
सूचना के अधिकार अधिनियम (आरटीआई) के तहत दायर एक आवेदन में नाथ ने कहा है कि ‘‘विध्वंसक गतिविधियों के कारण 7/8 दिसंबर, 1992 को परिसर को जला दिया गया था। मेरी जानकारी के अनुसार, संबंधित पक्ष को आज तक कोई अनुग्रह राशि नहीं दी गई है।’’
मुआवजे के संबंध में स्थिति स्पष्ट किये जाने की मांग करते हुए, उन्होंने राहत राशि प्राप्त करने वाले व्यक्ति का विवरण, वितरित की गई राशि और स्वीकृति आदेशों की जानकारी मांगी है। उनका कहना है कि अधिकारियों ने उन्हें बताया है कि भुगतान पहले ही किया जा चुका है।
रिकॉर्ड में दर्ज दस्तावेजों से पता चलता है कि ‘‘उस समय प्रचलित नियमों/मानदंडों के तहत स्वीकार्य 44,500 रुपये की राशि स्वीकृत कर वितरण के लिए राहत आयुक्त (एम) जम्मू को भेज दी गई है’’।
राहत एवं पुनर्वास आयुक्त के कार्यालय से जारी एक पत्र में हालांकि कहा गया है, ‘‘उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार, श्री शिव जी शर्मा पुत्र दामोदर शर्मा, महाराज कृष्ण पुत्र अमरनाथ और पुष्कर नाथ पुत्र शंभू नाथ, जो वेरीनाग, जिला अनंतनाग के निवासी हैं, को 07/08.12.1992 को आतंकवाद की घटना में उनकी अचल संपत्ति को हुए नुकसान के संबंध में कोई राशि वितरित नहीं की गई है।’’
नाथ के अनुसार, न तो उन्हें और न ही उनके अन्य कानूनी वारिसों को कोई राशि प्राप्त हुई है। उन्होंने उस व्यक्ति का विवरण मांगा है जिसने कथित तौर पर मुआवजा राशि निकाली है।
इससे पहले परिवार ने अनुग्रह राशि की मांग करते हुए एक रिट याचिका के माध्यम से उच्च न्यायालय का रुख किया था और अदालत ने अधिकारियों को निर्धारित अवधि के भीतर मामले पर विचार करने का निर्देश दिया था।
समय बीतने और मूल दावेदारों की मृत्यु के साथ, मामले को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दूसरी पीढ़ी पर आ गई है, जो इस बात को लेकर स्थिति स्पष्ट किये जाने की मांग कर रही है कि क्या स्वीकृत राहत कभी सही लाभार्थियों तक पहुंची भी थी या नहीं।
मुख्य सूचना आयुक्त राज कुमार गोयल ने कहा कि प्रतिवादी अधिकारी की अनुपस्थिति में कथित संवितरण से संबंधित प्रमुख तथ्यों का पता नहीं लगाया जा सका।
उन्होंने कहा, ‘‘मामले के तथ्यों को देखते हुए, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पीआईओ, डीसी अनंतनाग की बात सुनना अनिवार्य है।’’
गोयल ने कहा कि ‘‘अधिकारी को सुनवाई का नोटिस पहले ही दिया जा चुका था, इसके बावजूद वह सुनवाई में उपस्थित नहीं हुए और न ही उन्होंने प्रासंगिक तथ्यों/तर्कों को प्रस्तुत करने के लिए कोई लिखित दस्तावेज भेजा है’’।
भाषा
देवेंद्र प्रशांत
प्रशांत