ईटानगर, 11 मई (भाषा) वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया है कि अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में स्थित खांगरी हिमनद के तेजी से पिघलने, अस्थिर भू-भाग के निर्माण और संभावित रूप से खतरनाक एक हिम निर्मित झील के बनने के संकेत मिले हैं, जिससे मागो चू बेसिन के निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा उत्पन्न हो सकता है। एक अधिकारी ने सोमवार को यह जानकारी दी।
यह निष्कर्ष पृथ्वी विज्ञान और हिमालय अध्ययन केंद्र (सीईएसएचएस) द्वारा राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र और नॉर्थ ईस्टर्न रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के सहयोग से किए गए पांचवें खांगरी हिमनद अभियान के दौरान सामने आए।
यह वैज्ञानिक अभियान चार मई को सीमा पार तक विस्तृत मागो चू बेसिन में शुरू हुआ, जो ब्रह्मपुत्र बेसिन प्रणाली का एक प्रमुख जलस्रोत क्षेत्र है। इसका उद्देश्य हिमनदों की स्थिति का आकलन, क्रायोस्फीयर निगरानी और पूर्वी हिमालय में जलवायु संबंधी खतरों का अध्ययन करना है।
सीईएसएचएस के निदेशक तागे ताना ने कहा कि अध्ययन के दौरान टीम ने खांगरी हिमनद में ‘‘चिंताजनक भू-आकृतिक परिवर्तन’’ देखे, जो उच्च हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को दर्शाते हैं।
अध्ययन में पाया गया कि हिमनद के निचले हिस्से में एक बड़ा धंसाव क्षेत्र विकसित हो रहा है, जहां हिमनद तेजी से टूट रहा है और अस्थिर भू-भाग की स्थिति बन रही है।
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी कि ऐसी अस्थिरता से भूस्खलन और मागो चू बेसिन में निचले क्षेत्रों के लिए जोखिम बढ़ सकता है।
वैज्ञानिकों की टीम ने लगभग 16,500 फुट की ऊंचाई पर एक नई झील का भी पता लगाया है, जो हिमनद के आगे बनने वाली झील (प्रोग्लेशियल लेक) है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह झील ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) का कारण बन सकती है, जिससे निचले इलाकों और नदी प्रणालियों, यहां तक कि सीमापार क्षेत्रों पर भी असर पड़ सकता है।
इस वर्ष सर्दियों में अच्छी बर्फबारी के बावजूद, शोधकर्ताओं ने पाया कि बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण खांगरी हिमनद का पिघलना चिंताजनक गति से जारी है।
दीर्घकालिक निगरानी को मजबूत करने के लिए टीम ने लगभग 17,000 फुट की ऊंचाई पर पांच नए वैज्ञानिक निगरानी उपकरण लगाए हैं।
टीम ने हिमनद के निचले हिस्से की मोरेन परत और पिघले पानी के नमूने भी रासायनिक विश्लेषण के लिए एकत्र किए।
अधिकारियों ने कहा कि यह अभियान पूर्वी हिमालय में हिमनद निगरानी, जल सुरक्षा और जलवायु जोखिमों को समझने में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक योगदान देगा।
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