कोलकाता, छह जुलाई (भाषा) कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया पर पोस्ट की वजह से एक व्यक्ति की सहायक प्राध्यापक पद पर नियुक्ति को रद्द करते हुए टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति को अपने धर्म को मानने का अधिकार है, लेकिन इसे दूसरों की आस्था को ठेस पहुंचाने की इजाजत नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह फैसला पश्चिम बंगाल के नरेंद्रपुर स्थित रामकृष्ण मिशन कॉलेज की उस याचिका पर दिया, जिसमें चार सितंबर, 2025 को तमाल दासगुप्ता को संस्थान में अंग्रेजी का सहायक प्राध्यापक नियुक्त करने के एकल पीठ के आदेश को चुनौती दी गई थी।
न्यायमूर्ति देबांग्सु बसाक और न्यायमूर्ति मोहम्मद शब्बर रशीदी की खंडपीठ ने माना कि उम्मीदवार के सोशल मीडिया पोस्ट दूसरे धर्मों के मानने वालों की भावनाएं आहत करने वाली थीं।
पीठ ने इस तथ्य को संज्ञान में लिया कि दासगुप्ता ने अपने धर्म के अलावा दूसरे धर्मों के बारे में कड़े विचार व्यक्त किए थे। अदालत ने उम्मीदवार की दलील को अस्वीकार कर दिया कि कॉलेज द्वारा उन्हें नौकरी न देने के फैसले ने उनकी अभिव्यक्ति की आजादी और धर्म का पालन करने के मौलिक अधिकारों को प्रभावित किया है।
अदालत ने यह भी संज्ञान में लिया कि पश्चिम बंगाल महाविद्यालय सेवा आयोग की ओर से इस पद पर दासगुप्ता को नियुक्त करने की सिफारिश किए जाने से पहले ही उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किए थे। इन पोस्ट में उन्होंने धर्मों, रामकृष्ण मिशन (जिसका यह महाविद्यालय एक हिस्सा है) के कामकाज और मिशन के संतों के बार में कड़े विचार व्यक्त किए थे।
खंडपीठ ने पिछले हफ्ते सुनाए गए फैसले में कहा, ‘‘हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने का मौलिक अधिकार है।’’
अदालत ने कहा, ‘‘हालांकि, किसी धर्म को मानने के अधिकार का अभिप्राय यह नहीं निकाला जा सकता कि उस व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति की आस्था या धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की अनुमति है।’’
महाविद्यालय प्रशासन ने एकल पीठ के उस आदेश के खिलाफ अपील की थी, जिसमें उसे दासगुप्ता को संस्थान में अंग्रेज़ी के सहायक प्राध्यापक पद पर नियुक्ति पत्र जारी करने और चार सप्ताह के भीतर उन्हें उस पद का कार्यभार संभालने की अनुमति देने का निर्देश दिया गया था।
एकल पीठ के फैसले को रद्द करते हुए खंडपीठ ने कहा कि संस्थान का फैसला पश्चिम बंगाल महाविद्यालय सेवा आयोग की सिफ़ारिश पर आधारित है और इसका दासगुप्ता की अभिव्यक्ति की आज़ादी या अपने धर्म का पालन करने के उनके मौलिक अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ता है।
अदालत ने कहा कि महाविद्यालय के शासी निकाय का यह फैसला कि दासगुप्ता इस पद के लिए उपयुक्त नहीं हैं, शैक्षणिक संस्थान के हित में था और यह उनके सोशल मीडिया पोस्ट पर आधारित था। इसलिए इस फैसले को अतार्किक नहीं माना जा सकता।
खंडपीठ ने महाविद्यालय प्रशासन के फैसले को सही ठहराते हुए कहा, ‘‘जब किसी फैसले को तर्कहीन नहीं माना जा सकता, तो उसे मनमाना भी नहीं कहा जा सकता।’’
इसमें कहा गया है कि पश्चिम बंगाल महाविद्यालय सेवा आयोग अधिनियम- 2012 के तहत, आयोग की सिफारिश के बावजूद नियुक्ति देने का अधिकार संबंधित शिक्षण संस्थान के पास है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि दासगुप्ता की उम्मीदवारी पर निष्पक्ष रूप से विचार किया गया था। पीठ ने कहा कि चयन प्रक्रिया में शामिल होने वाले उम्मीदवार को निष्पक्ष विचार का अधिकार तो है, लेकिन नियुक्ति का कोई स्पष्ट अधिकार नहीं है।
अदालत ने कहा कि इस अधिनियम के दायरे में आने वाले महाविद्यालय को पश्चिम बंगाल महाविद्यालय आयोग द्वारा सुझाए गए उम्मीदवार की नियुक्ति से इनकार करने का अधिकार है, बशर्ते यह फैसला ‘‘ईमानदारी से लिया गया हो, मनमाना न हो और संबंधित संस्थान के सर्वोत्तम हित में हो’’।
भाषा धीरज वैभव
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