(आदित्य देव)
नयी दिल्ली, 22 मई (भाषा) अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने दावा किया है कि आदिवासी विश्वास प्रणालियां हिंदू और सनातन परंपराओं का हिस्सा हैं।
उन्होंने अलग सरना धर्म संहिता की मांग को “समाज को विभाजित करने की साजिश” बताया है और दावा किया कि यह मांग चर्च द्वारा संचालित है, न कि स्वयं आदिवासी समुदायों द्वारा।
सिंह ने ‘पीटीआई वीडियो’ को दिए एक विशेष साक्षात्कार में आदिवासी क्षेत्रों, विशेष रूप से झारखंड में जनसांख्यिकीय परिवर्तनों पर चिंता व्यक्त की और दावा किया कि बड़े पैमाने पर इस तरह की प्रथा अंततः देश को कमजोर कर देगी।
उन्होंने यह भी दावा किया कि जनजातीय विश्वास प्रणालियां हिंदू और सनातन परंपराओं का हिस्सा हैं और “मूल रूप से, दोनों एक ही हैं”।
झारखंड और उससे सटे राज्यों के कुछ आदिवासी समूह सरकार से आदिवासियों के लिए सरना संहिता घोषित करने की मांग कर रहे हैं, उनका दावा है कि वे हिंदू नहीं हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी इस मांग का समर्थन किया है।
कुछ वर्ग सरना संहिता और जनगणना के दौरान एक अलग “सरना” धर्म का कॉलम रखने की मांग कर रहे हैं।
सिंह ने दावा किया कि आदिवासी समुदाय स्वयं सरना संहिता द्वारा प्रदत्त अलग धार्मिक पहचान की मांग नहीं कर रहे हैं और आरोप लगाया कि इस तरह के आंदोलन ने 1990 के दशक के बाद चर्च के समर्थन से गति पकड़ी।
उन्होंने कहा, “सरना धर्म संहिता समाज को विभाजित करने की साजिश का हिस्सा है। कुछ लोग इसमें शामिल हो गए हैं, लेकिन हमारे अनुसार, यह चर्च द्वारा संचालित है। यह हिंदू या स्वयं आदिवासी समाज का आंदोलन नहीं है।”
उन्होंने कहा, ‘‘1990 के दशक से पहले, इस तरह की मांगें इस रूप में मौजूद नहीं थीं। 1990 के दशक के बाद, उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में सरना धर्म संहिता के लिए व्यापक स्तर पर अभियान चलाना शुरू किया।”
सिंह ने आरोप लगाया कि हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली झारखंड सरकार के तहत इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान चर्च के प्रतिनिधियों ने सरना-संहिता की मांग का समर्थन करते हुए पत्र प्रस्तुत किए थे।
उन्होंने आरोप लगाया, “क्योंकि कई आदिवासी ईसाई चर्च संस्थानों से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं, इसलिए वे उनके प्रभाव में आ जाते हैं। यही कारण है कि सरना धर्म संहिता की मांग उठी।”
उन्होंने कहा, “जब हेमंत सोरेन ने यह मुद्दा उठाया, तो चर्च के प्रतिनिधि भी इसमें शामिल हो गए। झारखंड और अंडमान के बिशपों ने नेताओं से मुलाकात की और चर्च की ओर से एक पत्र सौंपा। उस पत्र में उन्होंने लिखा कि सरना धर्म संहिता चर्च की लंबे समय से चली आ रही मांग है।”
सिंह ने उन अभियानों की आलोचना की जो आदिवासियों को जनगणना अभिलेखों में हिंदू के बजाय सरना, गोंडी या भीली के रूप में अपनी पहचान दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
उन्होंने कहा, “चर्च के प्रतिनिधियों को सरना धर्म संहिता की मांग क्यों करनी चाहिए? यदि किसी को करनी भी हो तो, परंपरा का मूल रूप से पालन करने वालों को ही यह मांग करनी चाहिए थी।”
सिंह ने दावा किया कि इस तरह के अभियान जनसांख्यिकीय प्रारूप को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं।
उन्होंने कहा, “इसका जनसंख्या के जनसांख्यिकीय प्रारूप पर गहरा असर पड़ेगा। और अगर बड़े पैमाने पर जनसांख्यिकीय परिवर्तन होते हैं, तो देश कमजोर हो जाएगा।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस अभियान को बढ़ावा देने के लिए 25 से अधिक गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) का गठन किया गया है।
जब उनसे पूछा गया कि क्या आदिवासी आस्था प्रणालियां हिंदू परंपराओं से अलग हैं, तो सिंह ने कहा कि वे सनातन परंपरा का अभिन्न अंग हैं।
भाषा प्रशांत धीरज
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