गोवा में आवासीय परियोजना के खिलाफ एनजीओ की याचिका पर सुनवाई पर न्यायालय ने सहमति जतायी

गोवा में आवासीय परियोजना के खिलाफ एनजीओ की याचिका पर सुनवाई पर न्यायालय ने सहमति जतायी

गोवा में आवासीय परियोजना के खिलाफ एनजीओ की याचिका पर सुनवाई पर न्यायालय ने सहमति जतायी
Modified Date: September 2, 2026 / 06:53 pm IST
Published Date: September 2, 2026 6:53 pm IST

नयी दिल्ली, दो सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने गोवा के सानकोआले की खड़ी ढलान वाली पहाड़ियों पर प्रस्तावित उच्च घनत्व वाले आलीशान आवासीय परियोजना ‘अक्वा ईडन’ के निर्माण को चुनौती देने वाली एक गैर-सरकारी संस्था (एनजीओ) की याचिका पर सुनवाई करने पर बुधवार को सहमति जतायी।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता एनजीओ गोवा बचाओ अभियान (जीबीए) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम की दलीलों पर गौर करते हुए गोवा सरकार और मैसर्स परमेश कंस्ट्रक्शंस कंपनी लिमिटेड सहित अन्य पक्षों को नोटिस जारी किए।

एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड रश्मि नंदकुमार के माध्यम से दायर याचिका में मुंबई उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें परियोजना के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया गया था।

याचिका में कहा गया, ‘‘यह याचिका मोरमुगाओ योजना एवं विकास प्राधिकरण (एमपीडीए) द्वारा दो फरवरी, 2024 को दी गई विकास अनुमति, सानकोआले ग्राम पंचायत द्वारा 11 मार्च, 2024 को जारी किए गए निर्माण लाइसेंस और गोवा नगर एवं ग्राम नियोजन अधिनियम की धारा 17-ए के तहत तीन जून, 2025 को प्रतिवादी संख्या पांच (मेसर्स परमेश कंस्ट्रक्शंस कंपनी लिमिटेड) के पक्ष में दी गई बाद की अनुमति की वैधता और कानूनी स्थिति को चुनौती देते हुए दायर की गई है जो गोवा के सानकोआले गांव स्थित उस संपत्ति पर प्रस्तावित ‘अक्वा ईडन’ परियोजना के संबंध में हैं।’’

याचिका में कहा गया कि ‘‘यह परियोजना करीब 35,050 वर्ग मीटर भूमि पर प्रस्तावित बड़े पैमाने का उच्च घनत्व वाला आलीशान आवासीय विकास है, जिसमें करीब 85,886.06 वर्ग मीटर का स्वीकृत निर्मित क्षेत्र, कई आवासीय विला, 685 निजी स्विमिंग पूल और 800 से अधिक वाहनों के लिए पार्किंग की सुविधा शामिल है। इसका निर्माण सानकोआले ग्राम पंचायत के अधिकार क्षेत्र में आने वाले पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील पहाड़ी भू-भाग पर प्रस्तावित है।’’

एनजीओ ने आरोप लगाया कि यह परियोजना नियामकीय प्रावधानों को दरकिनार करने का ‘‘स्पष्ट उदाहरण’’ है और इसे ‘‘अधिकारों के दिखावटी इस्तेमाल’’ तथा ‘‘तकनीकी आंकड़ों में हेरफेर’’ के जरिये आगे बढ़ाया गया।

कानूनी चुनौती का मुख्य आधार स्थल की भौगोलिक बनावट है। गोवा भूमि विकास और भवन निर्माण विनियम, 2010 के तहत 25 प्रतिशत से अधिक ढलान वाले क्षेत्रों (नो-डेवलपमेंट स्लोप) पर निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित है।

याचिका में कहा गया कि राज्य के अधिकारियों ने पूरी जमीन की ढलान का ‘‘औसत निकालने’’ की एक ‘‘त्रुटिपूर्ण और गैर-मान्यता प्राप्त’’ पद्धति का इस्तेमाल करके इसे 25 प्रतिशत की सीमा के भीतर दिखाया।

याचिका में पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी) कथित तौर पर नहीं लिए जाने समेत कानून के कई ‘‘महत्वपूर्ण सवाल’’ उठाए गए हैं।

एनजीओ का दावा है कि परियोजना 20,000 वर्ग मीटर की निर्धारित सीमा से अधिक है, फिर भी अनिवार्य पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त किए जाने से पहले ही अनुमतियां दे दी गईं और पर्यावरणीय सुरक्षा को ‘‘भविष्य की औपचारिकता’’ मान लिया गया।

याचिका में उच्च न्यायालय के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने का अनुरोध किया गया है।

भाषा अमित नरेश

नरेश


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