न्यायालय ने दहेज हत्या के मामले में बीएसएफ जवान के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही खारिज की
न्यायालय ने दहेज हत्या के मामले में बीएसएफ जवान के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही खारिज की
(फाइल फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, 11 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने दहेज हत्या के एक मामले में आरोपी सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के एक जवान के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को मंगलवार को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग करना होगा।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने जवान की अपील मंज़ूर कर ली। इस अपील में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पिछले साल दिसंबर के आदेश को चुनौती दी गई थी।
उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के मेरठ में 2016 में उसके खिलाफ दर्ज किये गये मामले में आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया था।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अपीलकर्ता ने सीमा सुरक्षा बल के बटालियन कमांडेंट द्वारा जारी किए गए एक प्रमाणपत्र का हवाला दिया था। इस प्रमाणपत्र में बताया गया था कि संबंधित अवधि के दौरान उसे आधिकारिक ड्यूटी पर तैनात किया गया था और वह आधिकारिक कार्यों के सिलसिले में मेरठ से बाहर तैनात था।
खंडपीठ ने कहा कि उसी प्राथमिकी से जुड़े मामले में पूरी सुनवाई के बाद अधीनस्थ न्यायालय ने अपीलकर्ता के माता-पिता को बरी कर दिया था।
खंडपीठ ने कहा, ‘‘ उपरोक्त कारणों से, यह अदालत इस बात से संतुष्ट है कि अपीलकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग है और अपीलकर्ता के सिलसिले में इसे रद्द किया जाना जरूरी है।’’
शीर्ष अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता की शादी अप्रैल 2014 में हुई थी और जून 2016 में प्राथमिकी दर्ज की गई थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि अपीलकर्ता और उसके परिवार वालों ने दहेज के लिए महिला के साथ क्रूरता और उत्पीड़न किया था तथा उनकी मांग पूरी न होने पर महिला को फांसी पर लटकाकर मार डाला गया।
यह प्राथमिकी भारतीय दंड संहिता की धारा 304बी (दहेज के कारण मौत) और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के प्रावधानों समेत कथित अपराधों को लेकर दर्ज की गई थी।
अपील पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि प्राथमिकी या आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की शक्ति का दायरा अच्छी तरह से तय है।
अदालत ने कहा, ‘‘निस्संदेह, इस शक्ति का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर और सावधानी के साथ किया जाना चाहिए; इसका इस्तेमाल कभी भी किसी वैध अभियोजन को रोकने या शुरुआती चरण में ही छोटी सुनवाई करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।’’
खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने इस बात का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया है कि अगर मृत महिला की हत्या आरोपियों ने की थी और उसके बाद उसे फांसी पर लटका दिया था तो कमरा और मुख्य गेट अंदर से बंद कैसे पाए गए।
खंडपीठ ने कहा कि (यह ठीक है कि) घटना के दिन अपीलकर्ता का घटनास्थल पर मौजूद न होना, अपने आप में उसे आरोप से बरी नहीं करता है।
उच्चतम न्यायालय ने कहा,‘‘लेकिन, टेलीफोन पर एकमात्र बातचीत की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करने, साबित करने के लिए कभी भी कोई कॉल-डिटेल रिकॉर्ड हासिल नहीं किया गया, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह (कॉल) अपीलकर्ता को कथित (दहेज) मांग से जोड़ती है।’’
अपील को मंज़ूरी देते हुए शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया।
भाषा
राजकुमार नरेश
नरेश

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