यौन अपराधों की व्याख्या में सिर्फ शारीरिक कृत्य नहीं, पीड़िता की गरिमा और सहमति भी अहम: एनसीडब्ल्यू प्रमुख

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यौन अपराधों की व्याख्या में सिर्फ शारीरिक कृत्य नहीं, पीड़िता की गरिमा और सहमति भी अहम: एनसीडब्ल्यू प्रमुख

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  • Publish Date - July 16, 2026 / 10:14 AM IST,
    Updated On - July 16, 2026 / 10:14 AM IST

नयी दिल्ली, 16 जुलाई (भाषा) राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की अध्यक्ष विजया रहाटकर ने बुधवार को कहा कि यौन अपराधों की व्याख्या करते समय अदालतों को केवल शारीरिक कृत्य को आधार नहीं बनाना चाहिए, बल्कि पीड़िता की गरिमा, उसकी सहमति और घटना से उसके मन में पैदा हुए भय को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

रहाटकर की यह टिप्पणी पटना उच्च न्यायालय के उस फैसले के बाद आयी है, जिसमें मीडिया में आयी खबरों के अनुसार अदालत ने कहा था कि किसी महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना और उसकी छाती को दबाना बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता।

रहाटकर ने कहा, ‘‘यौन अपराधों की व्याख्या करते समय ध्यान केवल शारीरिक कृत्य तक सीमित नहीं होना चाहिए। पीड़िता की गरिमा, उसकी सहमति, घटना के समय उसने जो भय महसूस किया और उसे पहुंचे मानसिक आघात को भी समान रूप से महत्व दिया जाना चाहिए।’’

एनसीडब्ल्यू अध्यक्ष ने कहा कि न्याय का उद्देश्य केवल कानून की तकनीकी व्याख्या तक सीमित नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा, ‘‘यदि न्यायिक प्रक्रिया पीड़िता के वास्तविक अनुभवों और कानून की मूल भावना को नजरअंदाज कर केवल कानूनी तकनीकी पहलुओं तक सीमित रह जाए, तो न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ना स्वाभाविक है।’’

रहाटकर ने कहा, ‘‘निस्संदेह अदालतें कानून और उनके समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देती हैं। लेकिन यदि 18 वर्षों तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद भी पीड़िता को यह महसूस न हो कि उसे पूरा न्याय मिला है और गंभीर यौन अपराध के दोषियों को प्रभावी दंड न मिले, तो इससे महिलाओं का अपने ऊपर और न्याय व्यवस्था दोनों पर विश्वास कमजोर हो सकता है।’’

उन्होंने कहा कि महिलाओं की गरिमा, उनके शरीर पर उनके अधिकार और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा न्याय व्यवस्था की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘इस संदर्भ में मैं भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा अपनाए गए स्पष्ट, संवेदनशील और पीड़िता-केंद्रित दृष्टिकोण का स्वागत करती हूं।’’

मीडिया में आयी खबरों के अनुसार, उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को पटना उच्च न्यायालय के उस फैसले पर कड़ी आपत्ति जतायी थी, जिसमें कहा गया था कि महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना और उसके स्तनों को दबाना बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इस मामले में उच्च न्यायालय की टिप्पणियों पर विस्तृत आदेश जारी करेगी।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने ऐसे फैसले सुनाए जाने से पहले पर्याप्त और ‘‘गहन कानूनी अध्ययन नहीं किए जाने’’ पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की।

रहाटकर ने विश्वास जताया कि न्याय व्यवस्था आगे भी अधिक संवेदनशील, पीड़िता-केंद्रित और लैंगिक न्याय पर आधारित दृष्टिकोण अपनाते हुए महिलाओं की गरिमा और अधिकारों की रक्षा के प्रति दृढ़तापूर्वक प्रतिबद्ध रहेगी।

भाषा गोला प्रशांत

प्रशांत