कानूनी व्यवस्था की मजबूती न्यायाधीशों, वकीलों और विद्वानों के कौशल पर निर्भर करती है: प्रधान न्यायाधीश

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कानूनी व्यवस्था की मजबूती न्यायाधीशों, वकीलों और विद्वानों के कौशल पर निर्भर करती है: प्रधान न्यायाधीश

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  • Publish Date - September 23, 2026 / 09:17 PM IST,
    Updated On - September 23, 2026 / 09:17 PM IST

नयी दिल्ली, 23 सितंबर (भाषा) प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने बुधवार को कहा कि देश की कानूनी व्यवस्था की मजबूती न्यायाधीशों, वकीलों, विद्वानों और प्रशासकों के कौशल पर निर्भर करती है तथा कानूनी पेशेवरों की हर पीढ़ी के पीछे शिक्षकों की एक पीढ़ी होती है।

प्रधान न्यायाधीश ने उच्चतम न्यायालय में आयोजित कानून, न्याय और कानूनी शिक्षा पर मासिक व्याख्यान श्रृंखला का उद्घाटन किया। इस कार्यक्रम के दौरान प्रख्यात शिक्षाविद प्रोफेसर (डॉ.) रणबीर सिंह वार्षिक ‘सुप्रीम कोर्ट न्याय शिक्षा सम्मान’ पाने वाले पहले व्यक्ति बने।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने अपने संबोधन में कहा, ‘‘हम अक्सर संविधान को अधिकारों, शक्तियों पर सीमा और शासन की संरचनाओं की भाषा के माध्यम से देखते हैं, लेकिन यह उन परिस्थितियों के निर्माण की व्यापक प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है, जिनमें व्यक्ति समाज में सार्थक रूप से शामिल हो सकें और गरिमा तथा समानता के साथ अवसरों का लाभ उठा सकें।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मुझे विश्वास है कि प्रोफेसर रणबीर सिंह इस विशिष्ट विषय पर अपने ज्ञान और अनुभव का इस्तेमाल करेंगे तथा हमें यह समझने में मदद करेंगे कि समानता और अवसर का संवैधानिक वादा बदलते भारत की आकांक्षाओं को किस तरह लगातार पूरा कर सकता है।’’

उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे कानून के आयाम विकसित होते जा रहे हैं और नये सवाल सामने आ रहे हैं, हर न्यायाधीश, वकील और शिक्षाविद किसी न किसी रूप में इस विषय का विद्यार्थी बना रहता है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि ‘न्याय शिक्षा सम्मान’ शिक्षण कार्य को लोक सेवा के एक माध्यम के रूप में मान्यता देता है, क्योंकि शिक्षक जिन लोगों को तैयार करते हैं, वे ही अंततः कानून की व्याख्या करने, उसका पालन करने और उसे विकसित करने की जिम्मेदारी संभालेंगे।

उन्होंने कहा, ‘‘हमारी कानूनी व्यवस्था की मजबूती काफी हद तक उसके न्यायाधीशों, वकीलों, विद्वानों और प्रशासकों के कौशल पर निर्भर करती है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘और कानूनी पेशेवरों की हर पीढ़ी के पीछे शिक्षकों की एक पीढ़ी होती है, जिन्होंने उन्हें कानून की बेहतर समझ दी, उन्हें इसकी विधियों और मूल्यों से परिचित कराया तथा उन्हें आलोचनात्मक और स्वतंत्र रूप से सोचने के लिए प्रोत्साहित किया।’’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि कानून के साथ गंभीर जुड़ाव केवल मामलों के निपटारे के साथ समाप्त नहीं हो सकता, बल्कि इसमें सीखने, जिज्ञासा और बहस के लिए भी जगह होनी चाहिए।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि उनके पिता ने अपना पूरा कार्यकाल एक शिक्षक के रूप में बिताया और वह बड़े होते हुए देखते रहे कि शिक्षण कार्य के लिए किस तरह अनुशासन, तैयारी और समर्पण की आवश्यकता होती है।

उन्होंने कहा, ‘‘घर में हमें अक्सर याद दिलाया जाता था कि ‘शिक्षा ही सबसे बड़ा धन है’, जिसे कोई व्यक्ति हासिल कर सकता है।’’

उन्होंने कहा कि पहला ‘न्याय शिक्षा सम्मान’ प्रोफेसर सिंह को प्रदान किया गया है, जिनका भारत में कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक योगदान है।

भाषा देवेंद्र अविनाश

अविनाश