सुकेश चंद्रशेखर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में खुद को पेश करने का दोषी पाया गया

सुकेश चंद्रशेखर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में खुद को पेश करने का दोषी पाया गया

सुकेश चंद्रशेखर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में खुद को पेश करने का दोषी पाया गया
Modified Date: August 26, 2026 / 05:18 pm IST
Published Date: August 26, 2026 5:18 pm IST

(फाइल फोटो के साथ)

नयी दिल्ली, 26 अगस्त (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने कथित ठग सुकेश चंद्रशेखर को 2017 में भ्रष्टाचार के एक मामले में जमानत के लिए खुद को उच्चतम न्यायालय का एक न्यायाधीश बताकर एक विशेष न्यायाधीश को प्रभावित करने का दोषी ठहराया है तथा इस हरकत को न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता और मर्यादा का ‘सीधा अपमान’ बताया है।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट हर्षिता मिश्रा ने चंद्रशेखर को भादंसं की धाराओं –170 (खुद को सरकारी कर्मचारी के रूप में पेश करना), 189 (सरकारी कर्मचारी को नुकसान पहुंचाने की धमकी देना) और 507 (गुमनाम संदेश के जरिए आपराधिक धमकी देना) के तहत दोषी ठहराया है।

अदालत 27 अगस्त को चंद्रशेखर को सजा सुनायेगी।

अदालत ने 20 अगस्त को अपने आदेश में कहा, ‘‘यह मामला भविष्य के लिए इस बात की याद दिलाता रहेगा कि कानून की गरिमा किसी व्यक्ति की आवाज में नहीं होती—चाहे वह टेलीफ़ोन पर कितनी ही प्रभुत्ववादी क्यों न लगे—बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया की ईमानदारी में निहित होती है।’’

यह मामला 28 अप्रैल, 2017 को किये गये एक फोन से जुड़ा है, जब चंद्रशेखर भ्रष्टाचार के मामले में पुलिस हिरासत में था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, चंद्रशेखर ने पुलिस आरक्षी मंजीत का मोबाइल फोन हासिल किया और उससे पूनम चौधरी के आधिकारिक लैंडलाइन और मोबाइल फोन पर संपर्क किया, पूनम चौधरी उस समय ‘ भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम’ से जुड़े मामलों की विशेष न्यायाधीश थीं।

अदालत ने कहा कि चंद्रशेखर ने पहले शीर्ष अदालत के तत्कालीन एक न्यायाधीश के निजी सचिव और बाद में खुद न्यायाधीश बनकर बात की। आरोप है कि उसने न्यायमूर्ति चौधरी को जल्द से जल्द जमानत देने के लिए मनाने की कोशिश की और ऐसा न करने पर उन्हें करियर से जुड़े बुरे नतीजों की धमकी दी।

अदालत ने कहा,‘‘अदालत कक्ष में तो दरवाजे से ही प्रवेश किया जा सकता है तथा न्याय तक पहुंचने के लिए किसी की जगह लेने, डराने-धमकाने या बनावटी प्रभुत्व का इस्तेमाल करने जैसे ‘पिछले दरवाजे’ का सहारा नहीं लिया जा सकता। आरोपी ने न्यायिक प्रक्रिया में ठीक इसी तरह पिछले दरवाजे से घुसने की कोशिश की थी। सबूतों ने उस दरवाज़े को बंद कर दिया है।’’

न्यायाधीश ने कहा कि यह मामला धोखाधड़ी या किसी और का रूप धरने के आम मामलों से बिल्कुल अलग है, क्योंकि इसमें देश की सबसे बड़ी अदालत के अधिकार का इस्तेमाल करके किसी दूसरे न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने और इस तरह न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करने की कोशिश की गई थी।

अदालत ने दिल्ली पुलिस को आरक्षी मंजीत की भूमिका की दोबारा जांच करने का भी निर्देश दिया। इसमें यह भी शामिल है कि चंद्रशेखर को उसका मोबाइल फोन कैसे मिल गया, क्या फोन लॉक था, उसका पासवर्ड किसे पता था और फोन के कथित इस्तेमाल की जानकारी तुरंत क्यों नहीं दी गई।

भाषा

राजकुमार नरेश

नरेश


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