न्यायालय ने ‘वंदे मातरम्’ से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों के खिलाफ याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा

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न्यायालय ने ‘वंदे मातरम्’ से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों के खिलाफ याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा

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  • Publish Date - September 22, 2026 / 02:41 PM IST,
    Updated On - September 22, 2026 / 02:41 PM IST

(फाइल फोटो के साथ जारी)

नयी दिल्ली, 22 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने ‘वंदे मातरम्’ से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई के दौरान मंगलवार को केंद्र से कहा कि वह 1986 के उस फैसले को ध्यान में रखे, जिसमें राष्ट्रगान नहीं गाने वाले बच्चों को दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण दिया गया था।

अदालत ने कर्नाटक संगीत शैली के गायक टी. एम. कृष्णा की इस याचिका पर केंद्र से जवाब भी मांगा।

भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कृष्णा की उस याचिका पर सुनवाई की जिसमें ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह अंतरे गाना अनिवार्य करने वाले कानून को चुनौती देते हुए कहा गया है कि अंतिम चार अंतरे देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र का उल्लंघन करते हैं।

न्यायालय ने कहा कि उसे उम्मीद है कि ‘बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य’ मामले में उच्चतम न्यायालय के 1986 के फैसले में तय सिद्धांत संशोधित कानून पर भी लागू होगा। उस मामले में न्यायालय ने उन स्कूली बच्चों को दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण दिया था, जिन्होंने अपनी अंतरात्मा के आधार पर राष्ट्रगान गाने से इनकार किया था।

पीठ ने कहा कि यह तय करना न्यायालय का काम नहीं है कि राष्ट्रगीत क्या होगा लेकिन वह इस बात की समीक्षा करेगी कि कानून के तहत ऐसे व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा होती है या नहीं, जो अपनी अंतरात्मा की आवाज पर, विशेष रूप से धार्मिक आधार पर, इसे गाने से इनकार करता है।

पीठ ने कहा कि राष्ट्रगीत का निर्धारण लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का विषय है और न्यायालय ‘वंदे मातरम्’ से जुड़ी राष्ट्रीय भावना या आकांक्षाओं पर सवाल नहीं उठाएगा।

साथ ही, पीठ ने संकेत दिया कि केवल एक या अधिक अंतरे गाने से इनकार करने पर किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए, जो अपनी अंतरात्मा के आधार पर ऐसा करता है।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘जिस व्यक्ति को लगता है कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिले (धार्मिक स्वतंत्रता के) अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है या जो अपनी अंतरात्मा अथवा धार्मिक मान्यता के आधार पर आपत्ति करता है, उसे दंडात्मक कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ेगा।’’

उन्होंने कहा कि न्यायालय इस बात की समीक्षा नहीं कर रहा कि राष्ट्रगीत क्या होना चाहिए।

कृष्णा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने कहा कि संशोधन में ‘राष्ट्रगीत’ की परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे अनिश्चितता और इसके संभावित दुरुपयोग की गुंजाइश बनी रहती है।

उन्होंने यह भी कहा कि गृह मंत्रालय ने एक कार्यालय ज्ञापन के जरिए निर्देश जारी किए थे, जिन्हें राजपत्र में अधिसूचित नहीं किया गया और सरकार ने कार्यकारी निर्देशों के जरिये ‘वंदे मातरम्’ को लेकर पहले से चली आ रही समझ में बदलाव किया है।

मुरलीधर ने कहा कि संशोधन में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि ‘वंदे मातरम्’ का कौन-सा संस्करण या कौन-से अंतरे राष्ट्रगीत का हिस्सा माने जाएंगे।

न्यायमूर्ति बागची ने जब कहा कि परंपरागत रूप से ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत माना जाता रहा है, तो मुरलीधर ने कहा कि अब तक की स्थापित समझ इसके पहले दो अंतरों को लेकर थी।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी कहा कि संशोधन जल्दबाजी में और ‘‘राष्ट्रीय सहमति की प्रक्रिया के बिना किया गया।’’

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिकाकर्ता की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि ‘‘धर्मनिरपेक्षता इतनी संकीर्ण नहीं हो सकती।’’

मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा कि ‘‘कानून निर्माण नक्सलियों की सोच के अनुसार नहीं हो सकता।’’

मुरलीधर ने इस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे वापस लेने की अपील करते हुए कहा कि ऐसी टिप्पणी किसी विधि अधिकारी को ‘‘शोभा नहीं देती।’’

मेहता ने कहा कि उनका संदर्भ उन लोगों से था जो, उनके अनुसार, कानून बनाने की प्रक्रिया का सम्मान नहीं करते। सुनवाई के बाद मुरलीधर ने फिर टिप्पणी वापस लेने को कहा, लेकिन सॉलिसिटर जनरल ने इससे इनकार कर दिया।

मेहता ने कहा, ‘‘मैंने जो कहा, उसे दोहरा सकता हूं। कानून के अनुसार ही चलना होगा। मैंने जो कहा, उसके लिए मुझे कोई खेद नहीं है। मैंने कहा था कि संवैधानिक तरीका यही है, न कि वह जो कोई नक्सली चाहता है और मुझे इसका कोई खेद नहीं है।’’

मुरलीधर ने बाद में सॉलिसिटर जनरल पर ‘‘लोगों को प्रभावित करने के लिए बोलने’’ का आरोप लगाया।

पीठ ने इस बहस में हस्तक्षेप नहीं किया और कहा कि वह इन टिप्पणियों को संज्ञान में नहीं ले रही है।

सॉलिसिटर जनरल ने पीठ से याचिका पर नोटिस जारी नहीं करने का अनुरोध करते हुए कहा कि ऐसा करने से यह मुद्दा ‘‘सनसनीखेज’’ बन सकता है।

न्यायमूर्ति बागची ने केंद्र को जवाब देने का निर्देश देते हुए कहा कि पीठ इस स्तर पर औपचारिक नोटिस जारी करने की इच्छुक नहीं है, लेकिन उसे उम्मीद है कि ‘बिजो इमैनुअल’ मामले में घोषित कानून संशोधित प्रावधान पर लागू होगा।

याचिका में ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971’ की 2026 में संशोधित धारा तीन के साथ-साथ गृह मंत्रालय के 28 जनवरी और नौ जुलाई 2026 के आदेशों को चुनौती दी गई है।

भाषा सिम्मी नरेश

नरेश