नयी दिल्ली, 22 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने विवादित भूमि सौदों से संबंधित लंबे समय से जारी कानूनी लड़ाई को समाप्त करते हुए बुधवार को तमिलनाडु के थझाम्बुर गांव में यथास्थिति आदेश को रद्द कर दिया।
इस आदेश के कारण घर खरीदने वाले हजारों लोग अधर में लटके हुए थे।
राज्य सरकार द्वारा भूमि विवाद पर ‘‘टालमटोल’’ किए जाने पर गौर करते हुए, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि सरकार दशकों पहले के जमीन सौदों को इस तरह से बदलने या रद्द करने की कोशिश नहीं कर सकती, जिससे उन आम लोगों को नुकसान हो, जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से घर बनाए हैं।
न्यायमूर्ति कुमार ने कहा, ‘‘हम केवल इतना ही कह सकते हैं कि जो सरकार खुद को जनता के हित में काम करने वाली (कल्याणकारी) बताती है, उसे कई सालों बाद पुराने फैसलों या कामों को बदलने या उलटने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।’’
फैसले में कहा गया कि राज्य सरकार के लिए यह उचित नहीं है कि वह ऐसे नागरिकों की “दुर्दशा” की अनदेखी करे और बिना ठोस आधार के यह दावा करे कि उसकी जमीनें अवैध रूप से हस्तांतरित कर दी गईं, जबकि यह तथ्य नजरअंदाज किया जा रहा है कि ऐसे कार्य, यदि हुए भी हों, तो वे बहुत समय पहले हो चुके हैं।
अदालत ने कहा कि सरकार दशकों पुराने सौदों को खत्म करने की कोशिश कर उस भूमि पर अपने स्वामित्व के दावे को उचित नहीं ठहरा सकती, जो अब नागरिकों के कब्जे में है।
यह मामला कांचीपुरम जिले के थझाम्बुर गांव से संबंधित है, जहां स्वतंत्रता सेनानियों और अन्य व्यक्तियों को अवैध रूप से भूमि आवंटन के आरोप 2018 में एक जनहित याचिका (पीआईएल) के माध्यम से सामने आए थे।
यह भी आरोप लगाया गया कि व्यक्तियों को आवंटित भूमि निजी डेवलपर को अनुचित तरीके से बेच दी गयी।
इस परियोजना में शामिल प्रमुख कंपनियों में से एक ‘कैसग्रैंड बिल्डर प्राइवेट लिमिटेड’ थी, जिसने इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर आवासीय परियोजनाएं शुरू की थीं।
मद्रास उच्च न्यायालय ने शुरू में तमिलनाडु सरकार को ‘‘गोपनीय ढंग से जांच’’ करने की अनुमति दी थी, लेकिन राज्य ने 2019 में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश प्राप्त किया।
राज्य सरकार ने 2019 में एक सरकारी आदेश के माध्यम से जांच शुरू की थी, लेकिन 2020 और 2021 के बीच कई रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के बावजूद यह प्रक्रिया अनिर्णायक रही।
पीठ ने कहा, ‘‘राज्य सरकार और अधिकारियों को इस मामले में ढिलाई बरतते हुए यथास्थिति बनाए रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।’’
फैसले में कहा गया है कि 2020 से 2021 के बीच तीन जांच रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के बावजूद, राज्य अंतिम निर्णय लेने में विफल रहा है, और हाल में उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक और समिति नियुक्त की है।
इस फैसले से उन प्रमुख हितधारकों को काफी राहत मिली जिनकी परियोजनाएं ठप हो गई थीं।
इसमें ‘आर्मी वेलफेयर हाउसिंग ऑर्गनाइजेशन’ भी शामिल था, जिसने सैनिकों और अधिकारियों के लिए 852 फ्लैट बनाए थे, लेकिन यथास्थिति आदेश के कारण कई पंजीकरण रोक दिए गए थे।
फैसले के अनुसार, पूर्व न्यायाधीश के पी शिवसुब्रमण्यम की अध्यक्षता वाली समिति को अपनी रिपोर्ट पूरी करने के लिए चार महीने का समय दिया गया है, जिसके बाद राज्य मंत्रिमंडल को अंतिम निर्णय लेने के लिए दो महीने का समय मिलेगा।
भाषा
देवेंद्र अविनाश
अविनाश