उच्चतम न्यायालय ने भ्रष्टाचार के नये मामले में सेंथिल बालाजी की गिरफ्तारी पर रोक लगाई
उच्चतम न्यायालय ने भ्रष्टाचार के नये मामले में सेंथिल बालाजी की गिरफ्तारी पर रोक लगाई
नयी दिल्ली, 31 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) के नेता एवं पूर्व मंत्री वी. सेंथिल बालाजी को राहत देते हुए शुक्रवार को उन्हें तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा दर्ज किए गए भ्रष्टाचार के एक नये मामले में अगले आदेश तक अग्रिम जमानत दे दी।
भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कुछ शर्तों के साथ बालाजी की गिरफ्तारी पर अगले आदेश तक रोक लगा दी। पीठ ने जो शर्तें लगाई हैं उसके तहत बालाजी जांच में सहयोग करेंगे, अपना पासपोर्ट जमा कराएंगे और किसी गवाह को प्रभावित नहीं करेंगे।
न्यायमूर्ति बागची ने तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्णकुमार से कहा, ‘‘जमानत की शर्तों का तनिक भी उल्लंघन हो तो आप तुरंत हमारे पास आइए। हम अपने आदेश में बदलाव कर देंगे या उसे रद्द कर देंगे।’’
इससे पहले दिन में न्यायमूर्ति वी. मोहना ने बालाजी की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था।
उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु राज्य विपणन निगम (टासमैक) में कथित अनियमितताओं से जुड़े भ्रष्टाचार के नये मामले में अग्रिम जमानत का अनुरोध करने वाली बालाजी की याचिका पर सुनवाई के लिए बृहस्पतिवार को सहमति जताई थी।
मद्रास उच्च न्यायालय ने टासमैक घोटाला मामले में सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय द्वारा दर्ज प्राथमिकी में बालाजी की अग्रिम जमानत याचिका बृहस्पतिवार को खारिज कर दी थी।
इसके तुरंत बाद वरिष्ठ अधिवक्ताओं –कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी और अमित आनंद तिवारी– ने द्रमुक नेता की ओर से न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ से याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आग्रह किया था। उन्होंने कहा था कि बालाजी के खिलाफ किसी भी समय दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
सुनवाई के दौरान, प्रधान न्यायाधीश ने कृष्णकुमार से पूछा कि बालाजी से हिरासत में पूछताछ की जरूरत क्यों है, क्योंकि यह मामला मुख्य रूप से दस्तावेजी सबूतों पर आधारित है।
वरिष्ठ वकील ने जवाब दिया कि आरोप 2021-25 की घटना से जुड़े हैं और बालाजी ने प्राथमिकी दर्ज होने से रोका था क्योंकि वे उस समय मंत्री थे, इसलिए उन्हें अदालत से पूर्ण सुरक्षा नहीं मिल सकती।
बालाजी की ओर से वरिष्ठ वकीलों, मुकुल रोहतगी और अमित आनंद तिवारी, के साथ सिब्बल पेश हुए और कहा कि यह एक ‘अजीब मामला’ है, क्योंकि प्राथमिकी 28 जुलाई को तब दर्ज की गई जब मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के नेतृत्व में नयी टीवीके सरकार सत्ता में आई। यह प्राथमिकी एक दूसरे मामले में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा दायर हलफनामे पर आधारित थी।
उन्होंने कहा, ‘‘जिन घटनाओं की बात हो रही है, वे 2021-25 के दौरान की हैं। ईडी ने 2025 में इस अदालत में एक हलफनामा दायर किया था। जिस व्यक्ति ने हलफनामा दायर किया था, वह अब बदल गया है, क्योंकि नयी सरकार बन गई है। उसी हलफनामे के आधार पर 28 जुलाई को प्राथमिकी दर्ज की गई थी।’’
इसके बाद न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि वह अब मंत्री नहीं हैं और राज्य सरकार उनके प्रभाव में नहीं है, लेकिन न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि वह जांच से भागें नहीं और गवाहों को प्रभावित न करें।
कृष्णकुमार ने यह भी कहा कि यह भ्रष्टाचार का गंभीर मामला है और इसमें अग्रिम ज़मानत नहीं दी जानी चाहिए।
उच्च्तम न्यायालय ने याचिका पर तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा कि यदि मामले की जांच के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ आवश्यक हो, तो राज्य सरकार अदालत से अनुमति मांग सकती है।
बालाजी तमिलनाडु विधानसभा में कोयंबटूर दक्षिण सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं।
प्राथमिकी के अनुसार, टासमैक में दुकानों और बार के आवंटन में बड़े पैमाने पर घोटाला हुआ।
बालाजी ने आरोप लगाया कि प्राथमिकी में प्रवर्तन निदेशालय के हलफनामे और एजेंसी द्वारा उच्चतम न्यायालय में दाखिल याचिका के अंश शब्दशः शामिल किए गए हैं।
याचिका में कहा गया कि प्राथमिकी में कई स्थानों पर स्वयं यह उल्लेख किया गया है कि संबंधित सामग्री प्रवर्तन निदेशालय के जवाबी हलफनामे और याचिका से ली गई है।
वरिष्ठ अधिवक्ता तिवारी ने कहा, ‘‘हमारी दलील है कि प्राथमिकी उन घटनाओं को लेकर दर्ज की गई है, जो कथित तौर पर 2021 से 2025 के बीच हुईं। मेरे फरार होने की कोई आशंका नहीं है और हिरासत में पूछताछ की भी आवश्यकता नहीं है। मैं संबंधित विभाग का मंत्री था, जबकि टासमैक अपने अस्तित्व और कामकाज में एक स्वतंत्र निगम है।’’
उन्होंने इस कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध का उदाहरण भी बताया।
प्राथमिकी में करोड़ों रुपये की कथित सुनियोजित नकद रिश्वत योजना का विवरण दिया गया है। आरोप है कि बोतल आपूर्ति करने वाली कंपनियों ने शराब बनाने वाली इकाइयों के लिए फर्जी या बढ़ा-चढ़ाकर बिल तैयार किए।
इस घटना में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराओं 120बी, 167, 409, 109 और 420, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की संबंधित धाराओं 61(2), 201, 316(5), 49 और 318(4) तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (2018 में संशोधित) की धाराओं 7(सी), 12, 13(1)(ए) और 13(2) के तहत मामला दर्ज किया गया है।
भाषा संतोष सुरेश
सुरेश

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