जहरीली शराब त्रासदियों को रोकने के लिए उच्चतम न्यायालय का बहु-विभागीय रणनीति का सुझाव

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जहरीली शराब त्रासदियों को रोकने के लिए उच्चतम न्यायालय का बहु-विभागीय रणनीति का सुझाव

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  • Publish Date - September 18, 2026 / 06:50 PM IST,
    Updated On - September 18, 2026 / 06:50 PM IST

नयी दिल्ली, 18 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने जहरीली शराब से होने वाली मौतों पर अंकुश लगाने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शुक्रवार को कई उपाय सुझाए। शीर्ष अदालत ने जहरीली शराब के गैर-कानूनी उत्पादन, परिवहन और बिक्री पर रोक लगाने के लिए अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल बिठाकर काम करने की जरूरत पर ज़ोर दिया।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने महाराष्ट्र विष नियमावली के नियम 18ए और 18बी को रद्द करते हुए कई सुझाव दिए। ये नियम 2011 में मुंबई में ज़हरीली शराब से हुई एक बड़ी घटना के बाद एक अधिसूचना के जरिये लागू किए गए थे।

न्यायमूर्ति पारदीवाला ने अपने फैसले में लिखा, ‘‘इतिहास इस बात का गवाह है कि शराब पर पूरी तरह पाबंदी लगाने से अक्सर शराब का कारोबार गैर-कानूनी तरीके से होने लगता है, जिससे बिना नियमन वाली और जानलेवा शराब का चलन बढ़ जाता है।’’

न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कई सुझाव भी दिए।

इन सुझावों में अवैध शराब की आपूर्ति और मांग शृंखला तोड़ने, राज्य की सीमाओं पर सख्ती बढ़ाने और मेथनॉल के नियमन को कड़ा करने पर जोर दिया गया है।

मेथनॉल एक ऐसा रसायन है, जिसका इस्तेमाल नकली शराब बनाने में किया जा सकता है।

फैसले में कहा गया, ‘‘चूंकि शराब राज्य में बनती भी है और बाहर से भी लाई जाती है, इसलिए इसे लागू करने के कदमों में राज्य की सीमाओं पर कड़ी निगरानी शामिल होनी चाहिए। इस संबंध में, राज्य परिवहन विभाग का सीमाओं पर सतर्क रहना राज्य में शराब की अवैध ढुलाई को नियंत्रित करने में मदद करेगा…।’’

इसमें आगे कहा गया कि राज्य के भीतर शराब की खरीद, निर्माण, ढुलाई, बिक्री और सेवन से जुड़े कानूनों को लागू करना भी जहरीली शराब से होने वाली त्रासदियों को रोकने में अहम साबित होगा।

न्यायालय ने कहा, ‘‘राज्य पुलिस, क्रमशः मद्य निषेध विभाग और आबकारी विभाग के साथ मिलकर, स्थानीय शराब बनाने वाले अड्डों की पहचान कर सकती है और उनके खिलाफ कार्रवाई कर सकती है। ये अड्डे आमतौर पर राज्य के शहरी इलाकों में भीड़-भाड़ वाले या अर्द्ध-औद्योगिक क्षेत्रों में स्थित होते हैं।’’

इसमें कहा गया है कि नकली शराब के निर्माण में इस्तेमाल किया जाने वाला कोई भी रासायनिक विलायक आमतौर पर औद्योगिक इकाइयों से अवैध रूप से खरीदा जाता है।

फैसले में कहा गया, ‘‘इसलिए, उद्योग विभाग द्वारा औद्योगिक इकाइयों की निगरानी यह पता लगाने के लिए उपयोगी होगी कि कौन सी औद्योगिक इकाइयां ऐसे रासायनिक ‘सॉल्वैंट्स’ (विलायक) का निर्माण कर रही हैं और उन्हें अवैध रूप से शराब निर्माताओं को बेच रही हैं।’’

इसमें कहा गया है कि राज्य में मेथनॉल को विनियमित करने वाले मौजूदा नियमों (यदि कोई हैं) में संशोधन किया जाना चाहिए, जिसमें यह भी शामिल किया जाना चाहिए कि शराब परिवहन के लिए उपयोग किए जाने वाले वाहनों को किसी भी नियम का उल्लंघन होने पर बॉण्ड या जमानत पर रिहा नहीं किया जाएगा, जब तक कि अदालत कोई आदेश न दे।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘लाइसेंस और परमिट देने से जुड़े राज्य के नियमों की व्यापक समीक्षा करने की आवश्यकता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लाइसेंस या परमिट बिना सोचे-समझे न दे दिया जाए, बल्कि आवेदक के पूर्ववृत्त, साख और वास्तविक आवश्यकता के उचित सत्यापन के बाद ही दिया जाए।’’

इसमें कहा गया है कि मेथनॉल का कारोबार करने या उसका इस्तेमाल करने वाले हर लाइसेंस और परमिट धारक के लिए ज़रूरी होना चाहिए कि वे भंडारण, बिक्री आदि का पूरा रिकॉर्ड रखें, ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की स्थिति में जल्द से जल्द उसकी जांच हो सके।

फैसले में कहा गया है, ‘‘अगर कोई व्यक्ति लाइसेंस या परमिट की शर्तों या उसके तहत बने नियमों का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो उसका लाइसेंस या परमिट निलंबित या रद्द किया जा सकता है (जैसा भी मामला हो) और उसे भविष्य में कोई नया लाइसेंस या परमिट पाने से भी रोका जा सकता है।’’

इसमें कहा गया है कि मेथनॉल को सिर्फ़ उसी काम के लिए तय किए गए खास टैंकरों में ही ले जाया जाना चाहिए, ताकि चोरी या मिलावट की गुंजाइश न रहे।

भाषा

सुरेश दिलीप

दिलीप