नयी दिल्ली, दो मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से कथित तौर पर तैयार किए गए काल्पनिक फैसलों पर भरोसा करने वाली निचली अदालत का संज्ञान लेते हुए कहा है कि इसके आधार पर निर्णय लेना कोई त्रुटि नहीं, बल्कि कदाचार के बराबर होगा।
न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने कहा है कि वह मामले की विस्तार से पड़ताल करेगी। इसने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमनी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता तथा बार भारतीय विधिज्ञ परिषद को नोटिस जारी किया।
अदालत ने इस मामले में सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान को भी नियुक्त किया है।
पीठ ने कहा, ‘‘हम निचली अदालत के एआई निर्मित गैर-मौजूद, फर्जी या कृत्रिम कथित निर्णयों पर भरोसा करने का संज्ञान लेते हैं और इसके परिणामों तथा जवाबदेही की पड़ताल करना चाहते हैं क्योंकि इसका न्यायिक प्रक्रिया की शुचिता पर सीधा असर पड़ता है।’’
इसने 27 फरवरी के आदेश में कहा, ‘‘सबसे पहले, हमें यह स्पष्ट करना होगा कि इस प्रकार के निराधार और फर्जी कथित फैसलों पर आधारित निर्णय लेना, निर्णय लेने में त्रुटि नहीं है। यह कदाचार होगा और इसके कानूनी परिणाम भुगतने होंगे। यह आवश्यक है कि हम इस मुद्दे की अधिक विस्तार से पड़ताल करें।’’
यह मुद्दा शीर्ष अदालत के समक्ष तब सामने आया जब वह आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के जनवरी के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि यह मामला संस्थागत दृष्टि से काफी चिंता का विषय है।
इसने कहा, ‘‘अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और भारतीय विधिज्ञ परिषद (बीसीआई) को नोटिस जारी करें।’’
न्यायालय ने कहा कि मुकदमे के निपटारे तक, निचली अदालत ने विवादित संपत्ति की भौतिक विशेषताओं के विश्लेषण के लिए एक अधिवक्ता-आयुक्त नियुक्त किया था।
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने कुछ आपत्तियां उठाकर अधिवक्ता-आयुक्त की रिपोर्ट को चुनौती दी थी।
इसने कहा कि निचली अदालत ने पिछले साल अगस्त में अपने आदेश में आपत्तियों को खारिज कर दिया था और इस प्रक्रिया में कुछ निर्णयों पर भरोसा किया था।
इसके बाद, याचिकाकर्ताओं ने निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी और दलील दी कि जिन फैसलों का जिक्र किया गया और जिन पर भरोसा किया गया, वे अस्तित्वहीन और फर्जी थे।
शीर्ष अदालत ने उल्लेख किया कि उच्च न्यायालय ने आपत्ति पर विचार किया और पाया कि फैसले एआई द्वारा तैयार किए गए थे।
इसने कहा कि सावधानी बरतने की चेतावनी देते हुए उच्च न्यायालय ने मामले में गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने की कार्यवाही की और निचली अदालत के फैसले की पुष्टि करते हुए दीवानी पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।
इसके बाद, याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
पीठ ने याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई और इस संबंध में नोटिस जारी किया।
इसने मामले की सुनवाई 10 मार्च को निर्धारित करते हुए कहा, ‘‘विशेष अनुमति याचिका के निपटारे तक, हम निर्देश देते हैं कि निचली अदालत अधिवक्ता-आयुक्त की रिपोर्ट के आधार पर कार्यवाही न करे।’’
सत्रह फरवरी को एक अलग मामले की सुनवाई करते हुए, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व वाली शीर्ष अदालत की पीठ ने एआई उपकरणों से तैयार की गई याचिकाओं को दाखिल करने के वकीलों के बढ़ते चलन पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
राजनीतिक भाषणों पर दिशा-निर्देशों का आग्रह करने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान इसने ये टिप्पणियां कीं।
भाषा
नेत्रपाल माधव
माधव