उच्चतम न्यायालय वैवाहिक दुष्कर्म से जुड़े मामलों पर अंतिम सुनवाई तीन हफ्ते बाद शुरू करेगा

उच्चतम न्यायालय वैवाहिक दुष्कर्म से जुड़े मामलों पर अंतिम सुनवाई तीन हफ्ते बाद शुरू करेगा

उच्चतम न्यायालय वैवाहिक दुष्कर्म से जुड़े मामलों पर अंतिम सुनवाई तीन हफ्ते बाद शुरू करेगा
Modified Date: September 9, 2026 / 09:33 pm IST
Published Date: September 9, 2026 9:33 pm IST

नयी दिल्ली, नौ सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि वह वैवाहिक दुष्कर्म के विवादित मुद्दे से जुड़ी याचिकाओं को तीन हफ्ते बाद अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करेगा।

शीर्ष अदालत के समक्ष एक जटिल कानूनी सवाल उठाने वाली याचिकाएं विचाराधीन हैं कि क्या किसी पति को अपनी बालिग पत्नी के साथ उसकी मर्जी के खिलाफ यौन संबंध बनाने पर दुष्कर्म के आरोप में मुकदमे का सामना करने से छूट मिलनी चाहिए।

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-375 में दिए गए एक अपवाद के तहत अगर कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है या यौन क्रिया करता है-बशर्ते पत्नी नाबालिग न हो-तो उसे दुष्कर्म नहीं माना जाएगा।

आईपीसी को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) से बदल दिया गया है। बीएनएस की धारा-63 का अपवाद-2 भी कहता है कि “अगर कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है या यौन क्रिया करता है, बशर्ते पत्नी 18 साल से कम उम्र की न हो, तो यह दुष्कर्म नहीं है।”

वैवाहिक दुष्कर्म से जुड़ी याचिकाओं पर बुधवार को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ के समक्ष सुनवाई हुई।

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि मुख्य मामले में केंद्र की ओर से पहले दाखिल किए गए जवाबी हलफनामे को दूसरी याचिकाओं में भी जवाब के तौर पर माना जा सकता है।

पीठ ने कहा, “इस मामले को तीन हफ्ते बाद अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करें।”

उसने कहा कि मामले की सुनवाई बुधवार और बृहस्पतिवार के दिन की जाएगी।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “हम तारीख की सूचना देंगे।”

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि वह इस मामले के विभिन्न पहलुओं पर विचार करेगी, जिनमें यह सवाल भी शामिल है कि अगर वैवाहिक दुष्कर्म संबंधी अपवाद बना रहता है, तो क्या उसके बावजूद मुकदमा चलाया जा सकता है और क्या यह अपवाद खुद संवैधानिक रूप से वैध है।

वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने सात सितंबर को पीठ के समक्ष वैवाहिक दुष्कर्म के लिए पति के खिलाफ मुकदमा चलाने के अनुरोध वाली एक याचिका का जिक्र किया था।

शीर्ष अदालत ने तब कहा था कि इस मामले पर सुनवाई के लिए कोई उपयुक्त तारीख तय करने से पहले वह संबंधित याचिकाओं पर केंद्र का रुख जानना चाहेगा।

पीठ को बताया गया था कि इन याचिकाओं में आपराधिक कानून के तहत वैवाहिक दुष्कर्म से संबंधित प्रावधानों की संवैधानिक वैधता और उनकी व्याख्या का मुद्दा उठाया गया है।

उच्चतम न्यायालय ने 16 जनवरी 2023 को उन याचिकाओं पर केंद्र से जवाब तलब किया था, जिनमें आईपीसी के उस प्रावधान को चुनौती दी गई है, जो बालिग पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध बनाने के मामले में पति को अभियोजन से सुरक्षा प्रदान करता है।

बाद में शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे पर बीएनएस के समान प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर भी केंद्र को नोटिस जारी किया था।

वैवाहिक दुष्कर्म से जुड़ी याचिकाओं में से एक का संबंध इस मुद्दे पर दिल्ली उच्च न्यायालय के 11 मई 2022 के खंडित फैसले से है। यह याचिका एक महिला ने दायर की है, जो दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर याचिकाओं में से एक की याचिकाकर्ता थी।

उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजीव शकधर और न्यायमूर्ति सी हरि शंकर ने मामले में खंडित फैसला सुनाते हुए इस बात पर सहमति जताई थी कि याचिकाकर्ताओं को उच्चतम न्यायालय में अपील करने की अनुमति दी जानी चाहिए, क्योंकि इस मामले में कानून से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल शामिल हैं, जिन पर शीर्ष अदालत के फैसले की जरूरत है।

खंडपीठ की अध्यक्षता करने वाले न्यायमूर्ति शकधर ने वैवाहिक दुष्कर्म के अपवाद को “असंवैधानिक” बताते हुए इसे हटाने के पक्ष में फैसला दिया था। उन्होंने कहा था कि आईपीसी लागू होने के 162 साल बाद भी अगर किसी विवाहित महिला की न्याय की गुहार नहीं सुनी जाती है, तो यह “दुखद” होगा।

वहीं, न्यायमूर्ति शंकर ने कहा था कि दुष्कर्म से संबंधित कानून में वैवाहिक दुष्कर्म के लिए दिया गया अपवाद “असंवैधानिक” नहीं है और पति-पत्नी के संबंध को अन्य मामलों से अलग मानने के पीछे कानून में एक स्पष्ट और तर्कसंगत आधार मौजूद है।

इससे पहले, एक अन्य मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कहा था कि पति को अपनी पत्नी से दुष्कर्म और अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोपों में मुकदमे से छूट देना संविधान के अनुच्छेद 14 यानी कानून के समक्ष समानता के अधिकार के खिलाफ है।

भाषा पारुल माधव

माधव


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