नयी दिल्ली, 15 फरवरी (भाषा) तमिलनाडु कक्षाओं में वास्तविक दुनिया के अनुभव प्रदान करने के लिए अपने उच्च शिक्षण संस्थानों में उद्योग विशेषज्ञों को ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ के रूप में नियुक्त करने के मामले में सबसे आगे है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के आंकड़ों से यह बात सामने आई है।
आंकड़ों के मुताबिक, ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ की नियुक्ति के मामले में महाराष्ट्र दूसरे और गुजरात तीसरे स्थान पर है।
यूजीसी ने छात्रों को कक्षा में व्यावसायिक दक्षता प्रदान करने के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों में ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ (पीओपी) की नियुक्ति के लिए 2022 में दिशा-निर्देश जारी किए थे, ताकि शिक्षा और उद्योग जगत के बीच की खाई को पाटा जा सके।
पीओपी की नियुक्ति अस्थायी तौर पर की जाती है और इससे स्वीकृत पदों की संख्या पर कोई असर नहीं पड़ता है। पात्रता के लिए संबंधित क्षेत्र में कम से कम 15 वर्षों का अनुभव जरूरी है, खास तौर पर वरिष्ठ पदों पर।
यूजीसी के आंकड़ों के अनुसार, 349 उच्च शिक्षण संस्थानों की ओर से अब तक 1,841 पीओपी नियुक्त किए जा चुके हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, तमिलनाडु में सबसे ज्यादा 395 पीओपी की नियुक्ति की गई है, जिसके बाद महाराष्ट्र (193), गुजरात (179) और कर्नाटक (170) का स्थान आता है।
आंकड़ों पर गौर करें तो अकादमिक कार्यबल में उद्योग जगत के पेशेवरों की नियुक्ति के मामले में निजी विश्वविद्यालय (715) सबसे आगे हैं, जबकि केंद्रीय विश्वविद्यालयों ने अब तक केवल 15 ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ नियुक्त किए हैं। वहीं, डीम्ड विश्वविद्यालयों में ऐसी नियुक्तियों की संख्या 699, राज्य विश्वविद्यालयों में 212 और कॉलेजों में 200 दर्ज की गई है।
भारत के उच्च शिक्षा परिदृश्य में 56 केंद्रीय, 460 राज्य, 128 डीम्ड और 510 निजी विश्वविद्यालय के अलावा 45,000 से अधिक कॉलेज शामिल हैं।
यूजीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “इंजीनियरिंग, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, उद्यमिता सहित विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों को लाने और उद्योगों एवं समाज की जरूरतों को पूरा करने वाले पाठ्यक्रम विकसित करने तथा उच्च शिक्षण संस्थानों को उद्योग विशेषज्ञों के साथ संयुक्त अनुसंधान परियोजनाओं पर काम करने में सक्षम बनाने के लिए ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ की अवधारणा अपनाई गई थी, ताकि छात्रों को संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों का मार्गदर्शन प्रदान किया जा सके।”
उन्होंने कहा, “किसी संस्थान में ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ की सेवा की अधिकतम अवधि तीन साल से अधिक नहीं होनी चाहिए और असाधारण मामलों में इसे एक वर्ष और बढ़ाया जा सकता है। ऐसे में कुल सेवा अवधि किसी भी परिस्थिति में चार साल से अधिक नहीं होनी चाहिए।”
भाषा पारुल संतोष
संतोष