आईएसआई संस्थान के शिक्षकों, छात्रों ने केंद्र से विधेयक को आगे नहीं बढ़ाने की अपील की

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आईएसआई संस्थान के शिक्षकों, छात्रों ने केंद्र से विधेयक को आगे नहीं बढ़ाने की अपील की

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  • Publish Date - August 3, 2026 / 05:48 PM IST,
    Updated On - August 3, 2026 / 05:48 PM IST

कोलकाता, तीन अगस्त (भाषा) भारतीय सांख्यिकीय संस्थान (आईएसआई) के संकाय सदस्यों, कर्मचारियों और छात्रों ने केंद्र से अनुरोध किया है कि वे बिना व्यापक परामर्श के ‘भारतीय सांख्यिकी संस्थान विधेयक, 2026’ पर आगे न बढ़े।

उन्होंने चिंता जताई है कि यह प्रस्तावित कानून संस्थान की स्वायत्तता पर असर डाल सकता है और इसके मुख्यालय के रूप में कोलकाता के स्तर को लेकर अनिश्चितता पैदा कर सकता है।

केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने भारतीय सांख्यिकी संस्थान को वैधानिक ढांचा प्रदान करने के प्रावधान वाला यह विधेयक सोमवार को लोकसभा में पेश किया।

इस विधेयक में भारतीय सांख्यिकी संस्थान को नया वैधानिक ढांचा प्रदान करने का प्रावधान किया गया है।

यह विधेयक वर्ष 1959 के पुराने अधिनियम का स्थान लेगा ताकि आधुनिक शैक्षणिक और शोध जरूरतों को पूरा किया जा सके।

इसके तहत संस्थान को एक ‘कॉरपोरेट निकाय’ के रूप में स्थापित करने और उसके प्रशासनिक एवं अकादमिक ढांचे को मजबूत करने का प्रावधान है।

जाने-माने सांख्यिकीविद् प्रशांत चंद्र महालनोबिस द्वारा स्थापित यह संस्थान केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के तहत काम करता है और इस समय पश्चिम बंगाल सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1961 के तहत एक सोसाइटी के तौर पर पंजीकृत है।

संस्थान के एक संकाय सदस्य ने कहा कि प्रस्तावित कानून भारतीय सांख्यिकी अधिनियम, 1959 की जगह लेगा जिसके तहत इस प्रमुख संस्थान को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया था।

उन्होंने आरोप लगाया कि विधेयक आईएसआई सोसाइटी, संकाय सदस्यों, छात्रों या दूसरे हितधारकों से सलाह-मशविरा किए बिना तैयार किया गया था।

उन्होंने कहा, ‘‘संस्थान की तीन मुख्य इकाइयों- आईएसआई सोसाइटी, आईएसआई परिषद और अकादमिक परिषद ने विधेयक पर अपनी आपत्ति जताई है और मंत्रालय से बातचीत करने की मांग की है।’’

संकाय सदस्यों ने यह भी दावा किया कि विधेयक का मसौदा बनाते समय संस्थान के निदेशक से सलाह नहीं ली गई थी।

संकाय सदस्य कुंतल घोष ने कहा कि विधेयक में मौजूदा प्रतिनिधि परिषद की जगह केंद्र द्वारा नियुक्त संचालक मंडल को लाने का प्रस्ताव है, वहीं अकादमिक परिषद की शक्तियों को भी यह कम करता है।

उन्होंने तर्क दिया कि प्रस्तावित बदलावों से अकादमिक मामलों में सरकारी दखल बढ़ सकता है और संस्थान की स्वायत्तता कमजोर हो सकती है।

संस्थान के एक और प्रोफेसर अरिजीत बिष्णु ने कहा कि 1959 के कानून में खास तौर पर कोलकाता को संस्थान का मुख्यालय बताया गया है, लेकिन प्रस्तावित कानून में ऐसा कोई ज़िक्र नहीं है।

विधेयक को वापस लेने की मांग वाली एक याचिका पर शिक्षकों, छात्रों, पूर्व निदेशकों और पुराने छात्रों ने हस्ताक्षर किए हैं और इसे केंद्रीय सांख्यिकीय और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्री राव इंद्रजीत सिंह को सौंपा है।

भाषा वैभव नरेश

नरेश