नयी दिल्ली, 23 सितंबर (भाषा) तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा सचिवालय को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि पार्टी के उन बागी सदस्यों को संसदीय समितियों में शामिल न किया जाए, जो नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) से जुड़ गए हैं, क्योंकि उनके खिलाफ पद से अयोग्यता के अनुरोध वाली याचिकाएं लंबित हैं।
अभिषेक ने यह आग्रह ऐसे समय में किया है, जब कई संसदीय समितियों का कार्यकाल इस महीने खत्म होने वाला है और उनका पुनर्गठन किया जाना है।
सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा सचिवालय विभिन्न संसदीय समितियों के लिए नामांकन हासिल करने के सिलसिले में राजनीतिक दलों से संपर्क कर रहा है, क्योंकि विभागों से जुड़ी 24 संसदीय समितियों का कार्यकाल 26 सितंबर को खत्म हो रहा है।
संसदीय समितियों का कार्यकाल एक साल का होता है और इनका हर वर्ष पुनर्गठन किया जाता है।
सूत्रों ने बताया कि संसदीय समितियों के लिए नामांकन मांगने के लिए लोकसभा अधिकारियों की ओर से भेजे गए पत्र के जवाब में अभिषेक ने कहा कि एनसीपीआई में शामिल होने वाले तृणमूल के बागी सांसदों को किसी भी समिति का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए।
एनसीपीआई एक पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल (आरयूपीपी) है।
लोकसभा में तृणमूल संसदीय दल के नेता अभिषेक ने कहा कि उन 20 सांसदों को पद से अयोग्य ठहराए जाने के अनुरोध वाली याचिकाएं लंबित हैं, जिन्होंने मई में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार के तुरंत बाद पाला बदल लिया था।
सुदीप बंदोपाध्याय और काकोली घोष दस्तीदार सहित 20 बागी सांसदों ने जून में घोषणा की थी कि वे एनसीपीआई में शामिल हो रहे हैं और उन्होंने एक अलग संसदीय समूह के तौर पर मान्यता भी मांगी थी।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने फिलहाल इन याचिकाओं पर कोई फैसला नहीं लिया है और सदन के रिकॉर्ड में बागी सांसद अब भी तृणमूल कांग्रेस के सदस्य के तौर पर ही दर्ज हैं।
बागी सांसदों का कहना है कि उनका कदम दल-बदल विरोधी कानून के उस प्रावधान को पूरा करता है, जिसके तहत अगर किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई निर्वाचित सदस्य किसी दूसरी पार्टी में विलय के लिए सहमत हो जाते हैं, तो उन्हें पद से अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। उन्होंने कहा है कि तृणमूल कांग्रेस के 28 लोकसभा सदस्यों में से 20 के एनसीपीआई में शामिल हो जाने से जरूरी संख्या पूरी होती है।
हालांकि, अभिषेक ने दलील दी है कि दो-तिहाई सदस्यों के विलय का प्रावधान मूल राजनीतिक पार्टी पर लागू होता है, न कि सिर्फ उसके संसदीय दल पर। उन्होंने 19 जून को बिरला को 20 अलग-अलग याचिकाएं सौंपीं, जिनमें बागी सांसदों को संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत संसद सदस्य के रूप में अयोग्य घोषित करने का अनुरोध किया गया था।
अभिषेक ने कहा कि किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल होकर इन सांसदों ने स्वेच्छा से तृणमूल कांग्रेस की सदस्यता छोड़ दी है।
याचिकाओं के लंबे समय तक लंबित रहने के बाद अभिषेक ने उच्चतम न्यायालय का रुख कर लोकसभा अध्यक्ष को याचिकाओं पर जल्द फैसला लेने का निर्देश देने का अनुरोध किया।
शीर्ष अदालत ने 25 अगस्त को बागी सांसदों को नोटिस जारी किए और निर्देश दिया कि लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष अयोग्यता की कार्यवाही को तेजी से निपटाया जाए। इसके बाद, लोकसभा सचिवालय ने 26 अगस्त को सांसदों को नोटिस जारी कर सात दिन के भीतर उनसे जवाब मांगा।
इसके बाद बागी सांसदों ने नोटिस का जवाब देने के लिए और समय मांगा। बिरला ने तीन सितंबर को उन्हें जवाब दाखिल करने के लिए 22 सितंबर तक का समय दिया।
बताया जा रहा है कि सांसद अपने मामले में दल-बदल विरोधी प्रावधानों के लागू होने के बारे में कानूनी राय भी ले रहे हैं।
बागी सांसदों ने मंगलवार को लोकसभा सचिवालय से दल-बदल विरोधी कानून के तहत उनकी सदस्यता रद्द करने के अनुरोध वाली याचिकाओं पर जवाब देने के लिए चार हफ्ते का अतिरिक्त समय मांगा। लोकसभा सचिवालय ने उन्हें यह मोहलत दे दी।
तृणमूल के बागी सांसदों में सुदीप बंदोपाध्याय और काकोली घोष दस्तीदार के अलावा शताब्दी रॉय, प्रसून बनर्जी, रचना बनर्जी, जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया, पार्थ भौमिक, अरूप चक्रवर्ती, अधिकारी दीपक देव, सयानी घोष, बापी हलदार, मोहम्मद अबू ताहेर खान, कालीपद सरेन खेरवाल, असित कुमार मल, जून मलिया, मिताली बाग, खलीलुर रहमान, माला रॉय, शर्मिला सरकार और यूसुफ पठान शामिल हैं।
भाषा पारुल नरेश
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