कोलकाता, 22 जून (भाषा) तृणमूल कांग्रेस पर नियंत्रण को लेकर जारी लड़ाई में सोमवार को बड़ा घटनाक्रम सामने आया जब पार्टी के बागी गुट ने कोलकाता में एक विशेष सत्र आयोजित करके वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को कथित “वास्तविक” तृणमूल कांग्रेस का अध्यक्ष घोषित कर दिया।
यह कदम पार्टी प्रमुख और संस्थापक अध्यक्ष ममता बनर्जी के नेतृत्व को अब तक की सबसे सीधी संगठनात्मक चुनौती माना जा रहा है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद से पार्टी के विधायी और संसदीय ढांचे में असंतोष और बगावत के बाद बनर्जी के संगठन पर प्राधिकार को चुनौती मिली है।
कोलकाता के न्यू टाउन स्थित एक पांच सितारा होटल में आयोजित इस बैठक में बागी विधायक, पार्षद और विभिन्न जिलों के पूर्व जनप्रतिनिधि शामिल हुए।
पृष्ठभूमि ने ही इस आयोजन के राजनीतिक संदेश को स्पष्ट कर दिया। बैठक के मंच पर महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर और बी आर आंबेडकर की तस्वीरें प्रमुख रूप से लगी थीं, जबकि ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की तस्वीरें गायब थीं।
बागी खेमे ने दावा किया कि यह बैठक संगठन में “संवैधानिक संकट” को लेकर बुलाई गई थी।
बैठक को संबोधित करते हुए ऋतब्रत बनर्जी ने दलील दी कि पार्टी संविधान के अनुसार हर तीन साल में राष्ट्रीय कार्य समिति का गठन आवश्यक है और पिछली कार्य समिति फरवरी 2022 में बनी थी।
बैठक में मौजूद एक नेता ने ऋतब्रत बनर्जी के हवाले से कहा, ‘कार्यकाल खत्म होने के बाद संगठनात्मक ढांचे को नवीनीकृत नहीं किया गया। इसलिए, पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू करना जरूरी हो गया।’
बैठक में एक नयी राष्ट्रीय कार्य समिति का गठन किया गया, जिसमें प्रारंभिक सूची में फिरहाद हकीम, अरूप बिश्वास, बिप्लब मित्रा, अखरुज्जमां अंसारी, सबीना यासमीन, संदीपन साहा, रथिन घोष, जावेद खान और ऋतब्रत बनर्जी जैसे नाम शामिल किए गए।
बाद में समिति को 30 सदस्यों तक विस्तारित किया गया।
इसके बाद अरूप रॉय को सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया। वहीं फिरहाद हकीम, अरूप बिस्वास, रथिन घोष और सबीना यासमीन को उपाध्यक्ष बनाया गया, जबकि ऋतब्रत बनर्जी, जावेद खान और संदीपन साहा को महासचिव नियुक्त किया गया।
अखरुज्जमां अंसारी को बाद में कोषाध्यक्ष घोषित किया गया और धड़े ने पार्टी के वित्तीय मामलों की जांच के लिए एक ऑडिटर नियुक्त करने का भी निर्णय लिया।
बागी गुट से जुड़े कई प्रमुख नेता इस सत्र में शामिल हुए, जिनमें फिरहाद हकीम और अरूप बिश्वास के साथ-साथ बीरभूम और मुर्शिदाबाद जिलों के विधायक भी शामिल थे। गुट के सूत्रों के अनुसार लगभग 60 विधायक और बड़ी संख्या में पार्षद, जिनमें कोलकाता नगर निगम के कई प्रतिनिधि भी शामिल हैं, या तो बैठक में मौजूद थे या उन्होंने इसकी कार्यवाही का समर्थन किया।
कुछ ही दिन पहले 80 में से 58 विधायकों ने विधानसभा में विपक्ष के नेता पद के लिए ऋतब्रत बनर्जी के दावे का समर्थन किया था और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पसंद को खारिज कर दिया था। इसके बाद बागी गुट ने दावा किया है कि विधानसभा में उनकी संख्या बढ़कर लगभग 65 विधायकों तक पहुंच गई है।
संसद में, हाल ही में पार्टी को एक और झटका तब लगा जब उसके 28 में से 20 लोकसभा सदस्य कथित तौर पर तृणमूल संसदीय दल से अलग हो गए और उन्होंने नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय कर लिया, साथ ही भाजपा-नेतृत्व वाले राजग को समर्थन देने की घोषणा की।
सोमवार का यह विशेष सत्र संभवतः उस उद्देश्य से आयोजित किया गया था कि जो शुरुआत एक विधायी विद्रोह के रूप में हुई थी, उसे अब संगठनात्मक पुनर्गठन की प्रक्रिया में बदला जा सके।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मंच पर ममता बनर्जी की तस्वीरों को हटाकर राष्ट्रीय प्रतीकों को स्थान देना, साथ ही नए अध्यक्ष और पदाधिकारियों का औपचारिक चयन, यह दर्शाता है कि समूह खुद को केवल असंतुष्ट गुट नहीं बल्कि एक वैकल्पिक नेतृत्व संरचना के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है।
ममता बनर्जी द्वारा 1998 में स्थापित और लगभग तीन दशकों से उनकी राजनीतिक पहचान पर आधारित इस पार्टी के लिए ये घटनाक्रम एक असाधारण मोड़ माना जा रहा है।
बागी गुट के संगठनात्मक दावे कानूनी और राजनीतिक कसौटी पर टिकेंगे या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन सोमवार की बैठक ने यह संकेत दिया है कि पार्टी पर नियंत्रण की लड़ाई अब केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रही, बल्कि संगठन के मूल ढांचे तक पहुंच चुकी है।
भाषा अमित नरेश
नरेश