नयी दिल्ली, छह अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई मई के पहले सप्ताह तक के लिए टाल दी, जिसमें 2017 के उन्नाव बलात्कार मामले में पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की आजीवन कारावास की सजा के निलंबन को चुनौती दी गई है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि शबरिमला मामले में पुनर्विचार याचिका पर नौ-सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा सुनवाई पूरी कर लिये जाने के बाद इस मामले की सुनवाई की जाएगी।
सेंगर की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने पीड़िता के पिता की कथित हिरासत में मौत से संबंधित एक अन्य मामले में याचिकाओं की सुनवाई दिल्ली उच्च न्यायालय में नहीं होने का मुद्दा उठाया और कहा कि उस मामले में सेंगर को 10 साल की सजा सुनाई गई थी।
उन्होंने कहा, ‘‘दस साल संभवत: जल्द ही पूरे होने वाले हैं और अभी तक उच्च न्यायालय में कोई ठोस सुनवाई नहीं हुई है। मुझे (सेंगर को) इस मामले में जमानत मिलनी चाहिए।’’
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पीड़िता के वकील उच्च न्यायालय में सुनवाई स्थगित करवा रहे हैं।
पीड़िता के वकील महमूद प्राचा ने कहा कि उच्च न्यायालय में केवल एक बार सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया गया है।
प्रधान न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की इस सहमति पर गौर किया कि सेंगर से जुड़े एक अन्य मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय में सुनवाई स्थगित करने का कोई अनुरोध नहीं किया जाएगा।
न्यायूमर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘वकील (उच्च न्यायालय में) पूरा सहयोग देंगे।’
पिछले साल 29 दिसंबर को, उच्चतम न्यायालय ने 2017 के उन्नाव बलात्कार मामले में भाजपा से निष्कासित नेता सेंगर की आजीवन कारावास की सजा निलंबित करने संबंधी दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी थी और कहा था कि उसे हिरासत से रिहा नहीं किया जाएगा।
उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली सीबीआई की याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा कि इस मामले में कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न उठे हैं, जिनपर विचार करना आवश्यक है।
उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई की याचिका पर सेंगर का पक्ष जानने के लिए उसे नोटिस भी जारी किया था।
पीठ ने कहा कि वह इस तथ्य से अवगत है कि सामान्यतः जब किसी दोषी या विचाराधीन कैदी को निचली अदालत या उच्च न्यायालय के आदेश के तहत जमानत पर रिहा किया जाता है, तो संबंधित व्यक्ति को सुने बिना उस आदेश पर उसके द्वारा रोक नहीं लगायी जाएगी।
पीठ ने यह भी कहा कि सेंगर को एक अन्य मामले में भी दोषी ठहराया गया है और उस मामले में वह अब भी हिरासत में है।
पीठ ने कहा, ‘‘मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए हम उच्च न्यायालय द्वारा 23 दिसंबर, 2025 को पारित आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाते हैं। परिणामस्वरूप, प्रतिवादी (सेंगर) को उक्त आदेश के आधार पर हिरासत से रिहा नहीं किया जाएगा।’’
शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले में उसके विचार के लिए कानून से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न हुए हैं।
सीबीआई की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से उच्च न्यायालय के आदेश पर यह कहते हुए रोक लगाने का आग्रह किया था कि यह एक नाबालिग बच्ची के साथ ‘‘भयावह बलात्कार’’ की एक घटना थी।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 23 दिसंबर के अपने आदेश में कहा था कि सेंगर को पॉक्सो कानून की धारा 5(सी) के तहत दोषी ठहराया गया है, लेकिन एक निर्वाचित प्रतिनिधि भारतीय दंड संहिता की धारा 21 के तहत ‘‘लोक सेवक’’ की परिभाषा में फिट नहीं बैठता।
इस आदेश की कुछ वर्गों द्वारा आलोचना की गई थी और पीड़िता, उनके परिवार और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किए थे।
भाषा अमित सुरेश
सुरेश