अदालत में जाली दस्तावेज़ों के इस्तेमाल को हल्के में नहीं लिया जा सकता: उच्चतम न्यायालय

Ads

अदालत में जाली दस्तावेज़ों के इस्तेमाल को हल्के में नहीं लिया जा सकता: उच्चतम न्यायालय

  •  
  • Publish Date - June 23, 2026 / 08:59 PM IST,
    Updated On - June 23, 2026 / 08:59 PM IST

नयी दिल्ली, 23 जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि न्यायिक कार्यवाही में जालसाज़ी और नकली दस्तावेज़ों का इस्तेमाल गंभीर अपराध हैं और इन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब वह एक व्यक्ति को न्यायिक कार्यवाही के तहत मुचलके के तौर पर जाली राजस्व दस्तावेज़ का इस्तेमाल करने को लेकर मिली पांच साल की सजा में बदलाव कर रही थी।

पीठ ने कहा, ‘‘इसमें कोई शक नहीं है कि न्यायिक कार्यवाही में जालसाजी और नकली दस्तावेज़ों का इस्तेमाल गंभीर अपराध हैं। भारतीय दंड संहिता की धाराएं 467 (धोखाधड़ी), 468 (धोखाधड़ी के मकसद से जालसाज़ी) और 471 (नकली दस्तावेज़ का इस्तेमाल) उन अपराधों से संबंधित हैं, जो सार्वजनिक और कानूनी दस्तावेज़ों की प्रमाणिकता और शुचिता को कमज़ोर करते हैं। अदालत के सामने नकली दस्तावेज़ों के इस्तेमाल को हल्के में नहीं लिया जा सकता।’’

पीठ ने कहा कि सजा तय करते समय, अदालत को अपराध की प्रकृति और उससे जुड़े तथ्यों एवं हालात, आरोपी की भूमिका, जेल में बिताई गई अवधि, बीते समय और सजा तय करने के नियमों से जुड़ी अन्य राहत देने वाली परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाना होता है।

पीठ के अनुसार, ‘‘सजा तय करने की प्रक्रिया में ‘आनुपातिकता का सिद्धांत’ अहम है। सजा तय करने को सिर्फ़ बदला लेने की कार्रवाई नहीं माना जा सकता, जो मामले के तथ्यों और अपराधी की परिस्थितियों से अलग हो।’’

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संबंधित घटना 2014 की है और वह व्यक्ति एक दशक से ज़्यादा समय से आपराधिक कार्यवाही के साये में जी रहा है।

इसने कहा, ‘‘इस अदालत के सामने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया है जिससे पता चले कि अपीलकर्ता आदतन अपराधी है या वह मौजूदा घटना से पहले या बाद में किसी ऐसी ही आपराधिक गतिविधि में शामिल रहा हो।’’

शीर्ष अदालत ने कहा कि यह मामला संगठित अपराध, बड़े पैमाने पर आर्थिक धोखाधड़ी, सरकारी संस्थानों को प्रभावित करने वाली सुनियोजित जालसाजी या बार-बार की जाने वाली ऐसी धोखाधड़ी से जुड़ा नहीं है, जिससे बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान हुआ हो।

पीठ ने सज़ा को घटाकर उतनी ही अवधि का कर दिया, जितनी सज़ा वह व्यक्ति पहले ही काट चुका है। पीठ ने कहा, ‘‘हालांकि अपराध को हल्के में नहीं लिया जा सकता, लेकिन सजा अंततः मामले के तथ्यों और अपराध की गंभीरता के अनुपात में ही होनी चाहिए।’’

उस व्यक्ति ने इस मामले में दो साल से ज़्यादा समय जेल में बिताया था।

भाषा

सुरेश पवनेश

पवनेश