उत्तराखंड में मनाया गया पर्यावरण का त्योहार ‘हरेला’
उत्तराखंड में मनाया गया पर्यावरण का त्योहार 'हरेला'
देहरादून, 16 जुलाई (भाषा) प्रकृति और पौधारोपण को समर्पित उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला बृहस्पतिवार को प्रदेशभर में पूरे उत्साह के साथ मनाया गया लेकिन देहरादून में विकास परियोजनाओं के लिए सैकड़ों पेड़ों की कटाई को लेकर जारी विवाद का साया इस उत्सव पर भी पड़ा।
राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देहरादून और अल्मोड़ा में विभिन्न स्थानों पर पौधरोपण कर हरेला पर्व की शुरुआत की और लोगों से पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेने का आह्वान किया ।
मुख्यमंत्री ने देहरादून के ‘परेड ग्राउंड’ में मनाए जा रहे ‘लोक संवर्धन पर्व’ के तहत आयोजित हरेला उत्सव को संबोधित करते हुए कहा कि हरेला केवल हरियाली का पर्व नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक समरसता और प्रकृति के प्रति गहरी आस्था का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने इसी भावना के अनुरूप इस वर्ष हरेला पर्व के मौके पर पूरे प्रदेश में 10 लाख पौधे लगाने का संकल्प लिया है ।
उन्होंने कहा कि हरेला उत्तराखंड के महत्वपूर्ण लोकपर्वों में से एक है जो समाज के सभी वर्गों को एक सूत्र में जोड़ता है।
मुख्यमंत्री ने इस बात पर भी खुशी जताई कि अल्पसंख्यक समुदाय भी पूरे उत्साह के साथ इस पर्व में भागीदारी कर रहा है। उन्होंने कहा कि यह राज्य की साझा सांस्कृतिक विरासत और ‘विविधता में एकता’ की भावना का सशक्त उदाहरण है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि लोक संवर्धन पर्व राज्य की लोक संस्कृति, परंपराओं और लोक कलाओं को नयी पहचान देने का माध्यम बन रहा है।
उन्होंने प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी की सराहना करते हुए कहा कि उनके गीतों ने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्यावरण चेतना, ग्रामीण जीवन और सामाजिक सरोकारों को देश-दुनिया तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हालांकि, इस बीच देहरादून के सात मोड़ और अन्य क्षेत्रों में प्रस्तावित ऋषिकेश-भानियावाला राष्ट्रीय राजमार्ग चौड़ीकरण परियोजना के लिए पेड़ों की कटाई के खिलाफ प्रदर्शन जारी रहे। यह परियोजना राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के संवेदनशील हाथी गलियारे से होकर गुजरती है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि प्रकृति और वृक्ष संरक्षण के संदेश देने वाले हरेला जैसे पर्व के बीच बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई इस पर्व की मूल भावना के विपरीत है। कई पर्यावरण कार्यकर्ताओं और नागरिकों ने विरोध स्वरूप इस वर्ष हरेला के सरकारी कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखी।
पर्यावरणविद् अनूप नौटियाल ने कहा, ‘‘जब केवल देहरादून में ही सैकड़ों पेड़ काटे जा रहे हों, तो हम हरेला कैसे मना सकते हैं?’
प्रकृति प्रेमियों ने चेतावनी दी कि पेड़ों के लगातार कटान से पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील दून घाटी पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जो पहले ही तेजी से बढ़ते शहरीकरण और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के दबाव का सामना कर रही है।
भाषा दीप्ति सिम्मी
सिम्मी

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