पॉक्सो मामलों में पीड़ित या परिवार समझौता नहीं कर सकते : अदालत

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पॉक्सो मामलों में पीड़ित या परिवार समझौता नहीं कर सकते : अदालत

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  • Publish Date - September 24, 2026 / 08:12 PM IST,
    Updated On - September 24, 2026 / 08:12 PM IST

नयी दिल्ली, 24 सितंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में कहा है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों को पीड़ित या उसके परिवार द्वारा आपसी समझौते के जरिये नहीं निपटाया जा सकता, क्योंकि ऐसे मामलों में गंभीर अपराध शामिल होते हैं, जिनका समाज पर बुरा असर पड़ता है।

न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत मुकदमे का सामना कर रहे एक आरोपी की याचिका पर सुनवाई करते हुए 22 सितंबर को यह फैसला दिया। आरोपी ने नाबालिग पीड़िता के परिवार की मध्यस्थता से हुए समझौते के बाद मामले को रद्द करने का अनुरोध किया था।

अदालत को बताया गया कि मुकदमा अभी अभियोजन पक्ष के सबूत दर्ज किए जाने के चरण में है।

न्यायमूर्ति दत्ता ने आरोपी की याचिका खारिज करते हुए कहा कि समझौते के आधार पर इस चरण में कार्यवाही को रद्द करना कानून के मकसद और न्याय के उद्देश्यों, दोनों को ही विफल कर देगा।

उन्होंने कहा, “पीड़ित नाबालिग या उसका परिवार पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज किसी आपराधिक मामले में समझौता नहीं कर सकता।”

याचिकाकर्ता (49) पीड़िता के परिवार का परिचित है और उस पर 2022 में बच्ची का गंभीर यौन उत्पीड़न करने का आरोप है।

न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि उच्चतम न्यायालय की ओर से निर्धारित कानून के अनुसार, समझौते के आधार पर आपराधिक मामले को रद्द करने की उच्च न्यायालय की शक्ति का मानसिक विकृति वाले जघन्य और गंभीर अपराधों या यौन अपराधों से जुड़े मामलों में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा, “ऐसे मामलों में पीड़ित पक्ष और आरोपी के बीच हुआ समझौता कानूनी रूप से मान्य नहीं है… आरोप है कि भरोसे या अधिकार की स्थिति में मौजूद किसी व्यक्ति ने बच्ची का गंभीर यौन उत्पीड़न किया, जो भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376/506 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत दंडनीय अपराध है। ऐसे अपराध जघन्य अपराध हैं, जिनका समाज पर बुरा असर पड़ता है।”

भाषा पारुल नरेश

नरेश