नयी दिल्ली, 21 जून (भाषा) योग और श्वसन अभ्यास तनाव कम करने, हार्मोन का संतुलन बेहतर बनाने तथा चयापचय संबंधी स्वास्थ्य को मजबूत करने में मदद करके ‘पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम’ (बहु-अंतःस्रावी चयापचय अंडाशय सिंड्रोम यानी पीएमओएस) के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। विशेषज्ञों ने यह जानकारी दी।
पीएमओएस को पहले ‘पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम’ (पीसीओएस) के नाम से जाना जाता था।
दुनियाभर में लाखों महिलाओं को प्रभावित करने वाली इस बीमारी का नाम 2026 में बदलकर पीएमओएस किया गया, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इसका असर केवल अंडाशय पर ही नहीं, बल्कि शरीर की कई अंतःस्रावी और चयापचय प्रणालियों पर पड़ता है।
यह बीमारी आमतौर पर अनियमित मासिक धर्म, वजन बढ़ने, मुंहासे, गर्भधारण में समस्या और इंसुलिन प्रतिरोध से जुड़ी होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते प्रमाणों से पता चलता है कि तनाव भी बीमारी को बढ़ाने वाला एक महत्वपूर्ण कारण है, जिसकी अक्सर अनदेखी की जाती है।
‘व्यास (विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान) दिल्ली’ के निदेशक डॉ. रवींद्र मोहन आचार्य ने कहा कि योग को पीएमओएस के समग्र उपचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘पीएमओएस केवल प्रजनन या चयापचय संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर और मन दोनों को प्रभावित करने वाली स्वास्थ्य संबंधी बहुआयामी चुनौती है। इसके स्थायी प्रबंधन के लिए समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें चिकित्सकीय उपचार के साथ तनाव कम करने, योग, सजगता और जीवनशैली में बदलाव को अपनाया जाए, ताकि संतुलन बहाल हो और समग्र स्वास्थ्य बेहतर हो सके।’’
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में पाया गया कि व्यवस्थित योग कार्यक्रम से ‘पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम’ से पीड़ित किशोरियों में चिंता का स्तर कम करने और हार्मोन संबंधी मानकों में सुधार करने में मदद मिली। ‘जर्नल ऑफ अल्टरनेटिव एंड कॉम्प्लिमेंटरी मेडिसिन’ में प्रकाशित इस अध्ययन ने मानक उपचार के साथ-साथ सहायक उपाय के रूप में योग की संभावित भूमिका को रेखांकित किया।
दिल्ली स्थित एम्स की प्रोफेसर डॉ. रीमा दादा ने कहा कि पीएमओएस के बारे में बढ़ती समझ से यह स्पष्ट होता है कि शारीरिक लक्षणों के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना जरूरी है।
उन्होंने कहा, ‘‘इस बात के प्रमाण बढ़ रहे हैं कि मानसिक तनाव और हार्मोन संबंधी स्वास्थ्य आपस में गहराई से जुड़े हैं। लंबे समय तक रहने वाला तनाव प्रजनन और चयापचय प्रक्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। मानक चिकित्सकीय उपचार के साथ योग, ध्यान और तनाव प्रबंधन के अन्य उपायों को अपनाने से पीएमओएस से पीड़ित महिलाओं के शारीरिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है।’’
मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान के निदेशक डॉ. ईश्वर वी. बसवरड्डी ने कहा, ‘‘आसन, प्राणायाम और ध्यान समेत नियमित योगाभ्यास तनाव कम करने, तंत्रिका तंत्र का स्वत: संतुलन बेहतर बनाने और भावनात्मक दृढ़ता बढ़ाने में मदद करता है। ये अभ्यास हार्मोन के नियमन और चयापचय संबंधी स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं। इससे योग पीएमओएस के प्रबंधन में एक उपयोगी पूरक उपाय बन जाता है।’’
‘व्यास दिल्ली’ की सहायक निदेशक डॉ. कादंबिनी आचार्य ने कहा कि पीएमओएस के प्रबंधन का अर्थ केवल इसके दिखाई देने वाले लक्षणों का उपचार करना नहीं है।
उन्होंने कहा, ‘‘महिलाओं को होने वाला भावनात्मक तनाव, नींद की कमी और खराब जीवनशैली हार्मोन संबंधी स्वास्थ्य को काफी प्रभावित कर सकती है। योग, सजगता और विश्राम की तकनीकों को दिनचर्या में शामिल करके महिलाओं के शारीरिक, मानसिक और प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य में सुधार किया जा सकता है।’’
भाषा सिम्मी सुरेश
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