kinnar shankaracharya / image source: IBC24
Kinnar Shankaracharya controversy: भोपाल: भोपाल में महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित किन्नर शंकराचार्य पट्टाभिषेक कार्यक्रम ने सामाजिक और धार्मिक गलियारे में भारी विवाद पैदा कर दिया है। दरअसल, किन्नर काजल ठाकुर देश की पहली किन्नर शंकराचार्य बनी। इसपर अब विवाद खड़ा हो गया है। चलिए विस्तार से पूरा मामला बताते हैं।
दरअसल, भोपाल में महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित किन्नर शंकराचार्य पट्टाभिषेक कार्यक्रम ने सामाजिक और धार्मिक गलियारे में भारी विवाद पैदा कर दिया है। इस आयोजन में किन्नर काजल ठाकुर को देश की पहली किन्नर शंकराचार्य बनाने का प्रस्ताव था, जो कई संत समाज और धार्मिक समूहों के लिए अस्वीकार्य साबित हुआ।
संत समाज ने आयोजकों के खिलाफ नाराजगी जाहिर की है। उनका आरोप है कि इस कार्यक्रम ने सनातन परंपरा और शंकराचार्य गद्दी का अपमान किया है। संत समाज ने चेतावनी दी है कि अगर आयोजकों ने माफी नहीं मांगी, तो वे किन्नरों को पद लेने की अनुमति देने वाले कार्यक्रम में शामिल नहीं होने देंगे। संत समाज का कहना है कि अगर किसी को शंकराचार्य बनने की इतनी इच्छा है, तो इसे पारंपरिक पदों और मान्यताओं के अनुसार नाम बदलकर किया जाना चाहिए, जैसे “किन्नराचार्य”।
संत समाज ने यह भी साफ किया कि वे आयोजन में शामिल किन्नरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेंगे। इस नाराजगी के चलते पूरे आयोजन में धार्मिक और सामाजिक संवेदनाओं को लेकर तनाव का माहौल बन गया है।
किन्नर काजल ठाकुर को देश की पहली किन्नर शंकराचार्य बनाने का कार्यक्रम भोपाल के लालघाटी स्थित मैरिज गार्डन में सुबह 10 बजे से शुरू हुआ। इस विशेष अनुष्ठान में लगभग 200 किन्नर हिस्सा ले रहे थे, जो मुस्लिम धर्म छोड़कर हिन्दू धर्म में लौट रहे थे। आयोजकों ने इसे ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाला कार्यक्रम बताया, जिसमें पारंपरिक मंत्रोच्चारण और पूजा-पाठ शामिल था।
हालांकि, इस कार्यक्रम ने विवादों को जन्म दिया। सुरैया गुट ने आयोजकों को चेतावनी दी कि वे किसी भी हाल में आयोजन नहीं होने देंगे। उनका आरोप था कि ऋषि दास ने किन्नर काजल ठाकुर के साथ इस अनुष्ठान के माध्यम से धर्मांतरण के गंभीर आरोप फैलाए। गुट ने कहा कि वे इस तरह के धार्मिक उन्माद को रोकने के लिए कदम उठाएंगे।
जबलपुर के जगद्गुरु राघवदेवाचार्य ने इस खबर को सुनकर दुख व्यक्त किया। उनका कहना था कि आचार्य परंपरा में पद का बड़ा सम्मान है, और किसी को भी शंकराचार्य का पद अखाड़ा या कुंभ जैसे परंपरागत स्थल के बिना नहीं दे सकता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान में चारों शंकराचार्य अपनी गद्दी पर विराजमान हैं, और नए किन्नर शंकराचार्य बनाने का कोई प्रावधान परंपरा में नहीं है।
राघवदेवाचार्य ने यह भी कहा कि शंकराचार्य पद ब्राह्मण समुदाय के लिए आरक्षित है और इसे केवल पारंपरिक रीति-रिवाज और मान्यता के अनुसार ही प्रदान किया जा सकता है। उनके अनुसार साधु समाज और अखाड़ों के अध्यक्षों से आग्रह किया गया है कि इस तरह के कार्यक्रमों पर रोक लगाई जाए।