MP OBC Aarakshan Latest News: ‘युवाओं के अधिकारों से खिलवाड़!’ मप्र में ओबीसी आरक्षण 14% से 27% विवाद अब हाईकोर्ट के हाथ में, पूर्व सीएम कमलनाथ ने उठाए सवाल

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MP OBC Aarakshan Latest News: मध्यप्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने के लंबे समय से चले आ रहे विवाद में एक अहम मोड़ आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले से जुड़ी सभी लंबित अपीलों, विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) और ट्रांसफर याचिकाओं को वापस मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को भेज दिया है।

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  • Publish Date - February 21, 2026 / 01:56 PM IST,
    Updated On - February 21, 2026 / 02:01 PM IST

kamalnath/ image source: WIKIMEDIA

HIGHLIGHTS
  • सुप्रीम कोर्ट ने मामला हाईकोर्ट भेजा
  • ओबीसी आरक्षण 14% से बढ़ा 27%
  • कमलनाथ ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

MP OBC Aarakshan Latest News: भोपाल: मध्यप्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने के लंबे समय से चले आ रहे विवाद में एक अहम मोड़ आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले से जुड़ी सभी लंबित अपीलों, विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) और ट्रांसफर याचिकाओं को वापस मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को भेज दिया है। जस्टिस पी. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने निर्देश दिया कि राज्य की सामाजिक संरचना और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर आरक्षण नीति की वैधता की जांच करना हाईकोर्ट का ही दायित्व है।

MP OBC Reservation: OBC आरक्षण मामले में हाईकोर्ट करेगी सुनवाई

शीर्ष अदालत ने मप्र हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से कहा है कि इस मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष पीठ गठित की जाए, जो तीन महीने के भीतर सभी विवादों का अंतिम निपटारा करे। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने आरक्षण की वैधता के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है और अंतरिम आदेशों, जैसे भर्तियों पर लगी रोक जारी रहेगी या हटेगी, का निर्णय अब हाईकोर्ट की स्पेशल बेंच ही करेगी। इससे यह साफ हो गया है कि 2019 से अटके ओबीसी आरक्षण विवाद का अंतिम समाधान अब राज्य स्तर पर ही तय होगा। राज्य सरकार ने पहले प्रशासनिक कार्य प्रभावित होने का हवाला देकर नियुक्तियों की अनुमति मांगी थी, लेकिन अब नियुक्तियों का भविष्य भी हाईकोर्ट के फैसले पर निर्भर करेगा।

पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने उठाए सवाल

राजनीतिक स्तर पर भी इस निर्णय ने बहस को तेज कर दिया है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सोशल मीडिया मंच X पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ओबीसी आरक्षण का विवाद केवल कानूनी मुद्दा नहीं बल्कि लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी सरकार के समय 27% आरक्षण लागू किया जा चुका था, लेकिन बाद की परिस्थितियों में इसे रोक दिया गया, जिससे ओबीसी समाज को वास्तविक लाभ नहीं मिल पाया। कमलनाथ ने सवाल उठाया कि यदि एक सरकार अधिकार देती है तो दूसरी सरकार उसे लागू न करने को उपलब्धि कैसे मान सकती है।

कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सोशल मीडिया मंच X पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, ‘मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर जो घटनाक्रम सामने आया है, वह केवल एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ा सवाल है। मुझे हैरानी है कि हमारी कांग्रेस सरकार ने ओबीसी वर्ग को 27% आरक्षण देने की प्रक्रिया पूरी कर दी थी, और 27% आरक्षण प्रदेश में लागू भी हो गया था, लेकिन कुछ लोगों ने छल करते हुए इसे रोकने का काम किया, नतीजतन आज तक हमारे ओबीसी समाज को उसका वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है। आखिर यह कैसी व्यवस्था है, जिसमें एक सरकार अधिकार देती है, तो दूसरे दल की सरकार इसे लागू नहीं करने को अपनी उपलब्धि मानती है।

हाईकोर्ट से मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। प्रदेश के युवाओं को उम्मीद थी कि अब शीर्ष अदालत में ठोस तैयारी के साथ सरकार अपना पक्ष रखेगी और वर्षों से लटका विवाद सुलझेगा। लेकिन जो खबरें सामने आईं, वे चौंकाने वाली हैं। कभी सरकार के वकील अधूरी तैयारी के साथ पहुँचे, तो कभी समय पर उपस्थित ही नहीं हुए। क्या यह संवेदनशील मुद्दा इतनी लापरवाही से निपटाने लायक था? क्या सरकार को अंदाज़ा नहीं कि इस फैसले पर लाखों भर्तियाँ, हजारों परिवारों की उम्मीदें और पूरे समाज का विश्वास टिका हुआ है?

अब सुप्रीम कोर्ट ने मामला वापस हाईकोर्ट को भेज दिया है और विशेष पीठ बनाकर तीन महीने में निर्णय लेने को कहा है। सवाल यह है कि यदि शुरुआत से ही गंभीरता दिखाई जाती, तो क्या यह स्थिति बनती? क्या युवाओं को वर्षों तक असमंजस में रखा जाना चाहिए था? 2019 से शुरू हुआ यह विवाद आज 2026 तक खिंच चुका है। कितनी पीढ़ियाँ इस इंतज़ार में अपनी आयु सीमा पार कर चुकीं, कितनी भर्तियाँ अटक गईं, इसका हिसाब कौन देगा?

सरकार बार-बार दावा करती है कि वह पिछड़े वर्ग के साथ खड़ी है। लेकिन यदि 27% आरक्षण का लाभ वास्तविक रूप से लागू ही नहीं हो पा रहा, तो यह समर्थन केवल भाषणों तक सीमित क्यों दिखाई देता है? यदि नीति सही थी, तो उसकी कानूनी तैयारी पुख्ता क्यों नहीं थी? यदि सामाजिक न्याय का संकल्प था, तो अदालत में पक्ष मजबूती से क्यों नहीं रखा गया?

क्या हमारे देश में न्याय मिलना इतना कठिन हो गया है? या फिर न्याय की राह में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी सबसे बड़ी बाधा बन रही है? प्रदेश का ओबीसी वर्ग जवाब चाहता है। युवा जानना चाहते हैं कि उनका अधिकार कब तक अदालतों की तारीखों में उलझा रहेगा। सरकार को स्पष्ट करना होगा कि वह केवल घोषणा करती है या वास्तव में उसे लागू कराने की क्षमता और गंभीरता भी रखती है।

अब समय आ गया है कि सरकार राजनीतिक बयानबाज़ी से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई दिखाए। सामाजिक न्याय केवल घोषणा से नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प, कानूनी तैयारी और जवाबदेही से स्थापित होता है। मध्यप्रदेश का ओबीसी समाज अब प्रतीक्षा नहीं, परिणाम चाहता है।’

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